संसद से दूरी और लोकतंत्र की जवाबदेही
भारतीय लोकतंत्र में संसद को केवल ईंट-पत्थर से बनी एक इमारत नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों की उम्मीदों, आकांशाओं और उनके सामूहिक विवेक का सबसे बड़ा मंदिर माना जाता है। यह वह पवित्र मंच है जहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद, बहस और नीतियों की आलोचना के माध्यम से देश का भविष्य तय होता है। लेकिन वर्तमान में चल रहा संसद का मॉनसून सत्र एक अलग ही राजनीतिक और संवैधानिक परिदृश्य को जन्म दे रहा है। जब देश के सामने कुछ अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं, तब देश के सर्वोच्च कार्यकारी पदों पर बैठे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का सदन के भीतर से लगातार अनुपस्थित रहना भारतीय संसदीय प्रणाली की मूल आत्मा पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब हम यह देखते हैं कि ये दोनों शीर्ष नेता देश के अन्य हिस्सों में राजनीतिक रैलियों, संगठनात्मक बैठकों और विभिन्न बाहरी कार्यक्रमों में नियमित और सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। एक तरफ वे सार्वजनिक मंचों से अपनी नीतियों का बखान करने में तनिक भी संकोच नहीं करते, वहीं दूसरी तरफ देश के प्रतिनिधियों द्वारा चुने गए सदन—यानी संसद—के भीतर आकर जनता के ज्वलनशील सवालों का सामना करने से बचते नजर आते हैं। यह विरोधाभास इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कार्यपालिका धीरे-धीरे अपनी जवाबदेही के दायित्व से किस प्रकार विमुख हो रही है।
संसदीय लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत सामूहिक उत्तरदायित्व है। इसका अर्थ यह है कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है और मंत्रियों का यह नैतिक व संवैधानिक कर्तव्य है कि वे सदन में उपस्थित रहकर देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष के सवालों का स्पष्ट उत्तर दें। वर्तमान सत्र के दौरान, देश की राजधानी में छात्रों के आंदोलन पर पुलिसिया कार्रवाई, प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों और अन्य गंभीर राष्ट्रीय विषयों को लेकर भारी असंतोष है। विपक्ष लगातार यह मांग कर रहा है कि गृहमंत्री इन मुद्दों पर सदन में आकर अपनी बात रखें और एक विस्तृत बयान दें।
जब देश के गृहमंत्री या प्रधानमंत्री सदन में मौजूद नहीं होते हैं, तो संसद की पूरी कार्यवाही अर्थहीन सी प्रतीत होने लगती है। राज्यसभा में सभापति द्वारा संसदीय कार्यमंत्री किरेण रिजिजू से यह आग्रह करना पड़ा कि वे सदन की भावनाओं और विपक्ष की चिंता ओं से गृहमंत्री को अवगत कराएं, यह अपने आप में एक अभूतपूर्व और गंभीर घटना है। संवैधानिक पदों पर बैठे आसन की इस विवशता या अपील से यह साफ झलकता है कि सदन के भीतर संवाद की डोर किस हद तक कमजोर हो चुकी है। सत्ता पक्ष भले ही यह तर्क दे कि मंत्री अपने मंत्रालयों के एजेंडे और तय नियमों के अनुसार ही सदन में आते हैं, लेकिन राष्ट्रीय संकट और जनता से जुड़े गंभीर सरोकारों के समय शीर्ष नेतृत्व का इस तरह सदन से दूरी बनाना महज तकनीकी नियमों की आड़ लेना भर है। आज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है।
लोकतंत्र का मतलब केवल बहुमत के बल पर कानून पास करा लेना या एकतरफा भाषण देना नहीं है। असली लोकतंत्र संवाद, असहमति के सम्मान और तीखे सवालों के जवाब देने की संस्कृति पर टिका होता है। जब देश के नीति-निर्धारक संसद जैसे सर्वोच्च मंच को छोड़कर बाहर के सुरक्षित राजनीतिक मंचों को प्राथमिकता देते हैं, तो यह संदेश जाता है कि सरकार जनता की सीधी और कठिन जांच-परख से डरती है। संसद के भीतर जब मंत्रियों की उपस्थिति अनिवार्य की जगह वैकल्पिक या सुविधाजनक बन जाती है, तब आम जनता का उस व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है जो संविधान की रीढ़ है।
विरोध प्रदर्शनों और हंगामे के बीच सदनों का बार-बार स्थगित होना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता और विपक्ष के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। यदि देश के कर्णधार ही संसद की गरिमा को सहेजने के लिए तैयार नहीं होंगे, तो लोकतांत्रिक संस्थाएं धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देंगी। यह समय आत्मविश्लेषण का है। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि राजा हो या प्रधानमंत्री, हर कोई संसद के फर्श पर आकर देश के प्रति जवाबदेह हो। सिर्फ बाहरी आयोजनों में व्यस्त रहकर और संसद के पवित्र पटों से कन्नी काटकर देश के गंभीर मुद्दों का समाधान नहीं किया जा सकता। यदि भारतीय लोकतंत्र को उसकी वास्तविक जीवंतता और गरिमा के साथ बचाए रखना है, तो सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को सदन की सर्वोच्चता को स्वीकार करना होगा। संसद को केवल तमाशबीन या मुकदर्शक बनाने की प्रवृत्ति को त्यागकर फिर से स्वस्थ, गरिमामयी और जवाबदेह संसदीय परंपरा की ओर लौटना ही आज के समय की सबसे बड़ी और अनिवार्य मांग है।इससे भागना देश के लोकतंत्र को खतरे में डालने जैसा है।