पर्यावरण के लिए सबसे नुकसानदायक चीज का ईलाज निकला
वर्जीनिया टेक की खोज है यह विधि
पीवीसी को नष्ट करना बेहद कठिन
अब प्लास्टिक का कचड़ा भी कम होगा
राष्ट्रीय खबर
रांचीः वर्जीनिया टेक के रसायन शास्त्री और केमिकल इंजीनियर गुओलियांग ग्रेग लियू तथा उनकी शोध टीम ने पॉलिविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) को पॉलियाल्फाओलेफिन (पीएओ) में बदलने का एक नया तरीका खोज निकाला है। पीएओ इंजन ऑयल सहित कई महत्वपूर्ण औद्योगिक ल्यूब्रिकेंट्स (स्नेहक) का एक मुख्य घटक है। प्रसिद्ध शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित यह शोध एक साथ दो बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है: पहला, पीवीसी को रीसाइकल करने की जटिलता और दूसरा, औद्योगिक ल्यूब्रिकेंट्स का अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल तरीकों से उत्पादन।
पीवीसी को रीसाइकल करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि इसमें क्लोरीन मौजूद होती है और इसके निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर कई तरह के एडिटिव्स मिलाए जाते हैं। इन्हीं जटिलताओं के कारण बड़ी मात्रा में पीवीसी रीसाइकल न होकर कचरे के ढेर (लैंडफिल) में चला जाता है। दूसरी ओर, इंजन ऑयल जैसे ल्यूब्रिकेंट्स की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसके पारंपरिक उत्पादन से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। इस बेकार पीवीसी को ल्यूब्रिकेंट के घटक में बदलकर प्लास्टिक कचरे को कम किया जा सकता है।
प्लास्टिक से पहले भी स्वच्छ ईंधन बनाया गया
ल्यूब्रिकेंट्स आमतौर पर अधिक ध्यान आकर्षित नहीं करते, लेकिन आधुनिक मशीनरी के संचालन के लिए वे बेहद अनिवार्य हैं। लॉन मूवर और कारों से लेकर जेट इंजन तक में इंजन ऑयल का उपयोग होता है। लियू की प्रयोगशाला द्वारा विकसित यह प्रक्रिया कचरे के निपटान और प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ती समस्या को हल करने में मदद कर सकती है।
इस प्रक्रिया की शुरुआत उसी पीवीसी प्लास्टिक से होती है जिसका उपयोग आमतौर पर घरों की प्लंबिंग पाइप, खिड़कियों के फ्रेम और क्रेडिट कार्ड में किया जाता है। शोधकर्ता पीवीसी को एक विलायक में घोलकर उसमें एल्युमीनियम ट्राइक्लोराइड और अल्फा ओलेफिन मिलाते हैं। इस मिश्रण को 158 डिग्री फ़ारेनहाइट पर तीन घंटे तक गर्म किया जाता है। इसके बाद, गाढ़ा तेल जैसा ल्यूब्रिकेंट प्राप्त होता है। लियू के अनुसार, यह साबित हो चुका है कि प्लास्टिक कचरे से उच्च प्रदर्शन वाले ‘ग्रीन’ ल्यूब्रिकेंट्स बनाना पूरी तरह संभव है।
यह प्रोजेक्ट टीम के पिछले शोध पर आधारित है, जो पहले साइंस और नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुआ था। शुरुआत में प्रयोगों के दौरान केवल चिपचिपा पदार्थ ही बन पा रहा था। तब लियू ने विचार किया कि अगर यह पदार्थ इतना चिपचिपा है, तो क्यों न इसके पॉलिमर चेन को और छोटे टुकड़ों में तोड़कर देखा जाए। यह कदम मील का पत्थर साबित हुआ। टेक्सस ए एंड एम यूनिवर्सिटी और कैलटेक के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किए गए परीक्षणों में इस नए तेल का प्रदर्शन उत्कृष्ट पाया गया। वैज्ञानिक अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर ले जाना चाहते हैं।
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