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जनता की अदालत में बेनकाब होती असली सोच

राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गया है। हाल ही में वहां हुए पुलिस लाठीचार्ज की गूंज अब देश की सरहदों से लेकर संसद के गलियारों तक सुनाई दे रही है। इस घटना ने केवल आम नागरिकों और विपक्ष को ही नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस गंभीर घटना पर देश के गृह मंत्री की चुप्पी का क्या अर्थ निकाला जाए? क्या यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं की अनदेखी है या फिर किसी नई राजनीतिक शैली का उभार? जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों या समूहों पर हुआ लाठीचार्ज किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक कहा जा सकता है। पुलिसिया कार्रवाई की तस्वीरें और वीडियो जब सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में आए, तो पूरे देश में रोष फैल गया। सवाल यह है कि आखिर क्या ऐसी आपात स्थिति आन पड़ी थी कि नागरिकों की आवाज को डंडों के बल पर दबाने का प्रयास किया गया?

लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन जब सत्ता इस अधिकार को कुचलने पर उतर आती है, तो सवाल सीधा सरकार के मुखिया और देश के गृह मंत्री की नीयत पर उठते हैं। जब सड़क पर बवाल मचा हुआ था, तो देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद से उम्मीद थी कि इस पर तीखी बहस होगी और देश के गृह मंत्री अमित शाह इस पर स्पष्टीकरण देंगे। लेकिन इसके विपरीत, संसद के भीतर एक बेहद अजीब और चिंताजनक स्थिति बनी हुई है।

विपक्ष के बार-बार और जोरदार हंगामे के बावजूद केंद्रीय गृह मंत्री ने इस मुद्दे पर सदन के भीतर एक शब्द भी नहीं बोला है। तथ्य यह है कि अमित शाह सदन की कार्यवाही से पूरी तरह दूर नहीं हैं। वह संसद परिसर में आ रहे हैं, विभिन्न बैठकों और कार्यक्रमों में हिस्सा भी ले रहे हैं, लेकिन सदन के पटल पर आकर इस मुद्दे पर बयान देने से बच रहे हैं। इस चुप्पी से राजनीतिक गलियारों में दो मुख्य बातें बहुत साफ तौर पर उभरकर सामने आ रही हैं।

संसदीय परंपराओं और लोकतंत्र की अवहेलना: पहली बात यह साफ होती है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसद के सर्वोच्चता की अहमियत धीरे-धीरे कम की जा रही है। यह इस बात का प्रतीक है कि सत्ता में बैठे शीर्ष नेताओं को अब विपक्ष के सवालों के जवाब देने या संसद के प्रति जवाबदेह होने की कोई खास आवश्यकता महसूस नहीं होती।

उन्हें यह भरोसा है कि जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजबूत राजनीतिक आच्छादन उनके सिर पर है, तब तक उनका कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हो सकता। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमित शाह की राजनीतिक परवरिश उस मॉडल से हुई है जहाँ विपक्ष का प्रतिरोध या तो बहुत कमजोर होता था या फिर नगण्य।

गुजरात की राजनीति में बिना किसी मजबूत और आक्रामक प्रतिरोध के फैसले लेने के अभ्यस्त रहे अमित शाह को शायद राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति में पहली बार ‘लोहे के चने चबाने’ जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। जहाँ विपक्ष सड़क से लेकर सदन तक आक्रामक तेवर अपनाए हुए है, वहाँ यह चुप्पी इस बात का भी संकेत हो सकती है कि वे इस तरह के बहुआयामी दबाव से निपटने में असहज महसूस कर रहे हैं।

भले ही संसद के भीतर गृह मंत्री और सत्ता पक्ष इस मुद्दे पर बोलने से कतरा रहे हों, लेकिन इन तमाम घटनाओं ने देश की जनता के सामने एक स्पष्ट तस्वीर रख दी है। जनता अब बहुत करीब से देख रही है कि संकट के समय देश के जिम्मेदार मंत्री किस तरह जवाबदेही से बचते हैं और उनका अहंकार या राजनीतिक रणनीति किस हद तक जनहित से ऊपर हो जाती है।

यह घटनाक्रम देश के राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ा सबक है। यह बताता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने या बहुमत हासिल करने का नाम नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता और संसद के प्रति जवाबदेही की मांग करता है। यदि संसद के भीतर सवाल पूछने के अधिकार को यूं ही अनसुना किया जाता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता का लोकतंत्र से भरोसा ही उठ जाएगा।

गृह मंत्री की यह चुप्पी उनकी ताकत नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विवशता और जवाबदेही से भागने की प्रवृत्ति को ज्यादा उजागर करती है। लिहाजा आने वाले दिनों में इस किस्म के आचरण का राजनीतिक प्रभाव भी भारतीय जनता पार्टी के अंदर से देखने को मिलेगा क्योंकि उस दल में भी अनेक लोग ऐसे हैं, जो दिल से लोकतंत्र पर भरोसा करते हैं और वर्तमान स्थिति उन्हें भी पीड़ा दे रही है।