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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के मायने

भारतीय राजनीति में लंबे समय से एक धारणा स्थापित करने की कोशिश की जा रही थी कि वर्तमान सत्ता तंत्र दबाव में फैसले नहीं लेता। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई शीर्ष नेता समय-समय पर बड़े गर्व से यह दावा करते रहे हैं कि हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस राजनीतिक मिथक को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का जाना भर नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। वैसे इस बात को समझना होगा कि धर्मेंद्र प्रधान को हटाना कोई आसान फैसला नहीं था। कोई इस पर बात नहीं करता लेकिन सच तो यह है कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर अभी आरएसएस का कब्जा है।

इस कब्जे के लिए ही एक दूसरे स्वयंसेवक को मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है ताकि सारे फैसले आरएसए की सोच के अनुकूल हो। विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति तक में राज्यपाल इसी अनौपचारिक निर्देशों का पालन करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा को समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया कदमों का विश्लेषण करना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने लगातार दो रातों तक वीडियो संदेश जारी कर देश का माहौल भांपने की कोशिश की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन वीडियो संदेशों के जरिए सीधा जनसंवाद स्थापित करने का प्रयास दरअसल सत्ता की एक गहरी चिंता को दर्शाता है। इससे यह साफ हो गया कि तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ का समाज पर जो एकाधिकार और प्रभाव कभी हुआ करता था, उसके खात्मे को अब खुद प्रधानमंत्री और उनकी रणनीति टीम भी भली-भांति समझ चुकी है। एक समय था जब मुख्यधारा का मीडिया सरकार के लिए रक्षा कवच का काम करता था और किसी भी बड़े मुद्दे पर जनता की राय को आसानी से मोड़ दिया जाता था।

लेकिन डिजिटल क्रांति, सोशल मीडिया के स्वतंत्र मंचों और सीधे जन-संवाद के नए माध्यमों ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। जमीनी स्तर से आ रहे सीधे फीडबैक और बेअसर होते गोदी मीडिया के प्रभाव के बीच, प्रधानमंत्री और उनके रणनीतिकारों को यह अहसास हो गया कि पुरानी रणनीति अब कारगर नहीं रही। जब मुख्यधारा के मीडिया के जरिए माहौल को शांत करना मुमकिन नहीं रहा, तो मजबूरी में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का कड़ा और अनिच्छुक फैसला लेना पड़ा। इस मजबूरी के पीछे सबसे बड़ा और निर्णायक कारक देश का युवा वर्ग है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, बेरोजगारी, और अनिश्चित भविष्य से जूझ रहे युवाओं का गुस्सा अचानक सड़कों पर फूट पड़ा। कई राज्यों और इलाकों से ऐसी खबरें आईं जहां उग्र युवाओं ने भाजपा नेताओं, सांसदों और विधायकों का न केवल विरोध किया, बल्कि कुछ स्थानों पर हमले की चिंताजनक घटनाएं भी सामने आईं। जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जनता का यह आक्रामक रुख सत्ताधारी दल के शीर्ष नेतृत्व के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं था।

नरेंद्र मोदी और उनके चुनावी रणनीतिकार इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि भारत का युवा वर्ग केवल एक सामाजिक समूह नहीं है, बल्कि यह देश का सबसे बड़ा और निर्णायक ‘वोट बैंक’ है। 2014 और 2019 के आम चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत में युवाओं की अहम भूमिका रही थी। ऐसे में, यदि यह विशाल युवा वर्ग सरकार से पूरी तरह छिटक जाता या स्थायी रूप से खिलाफ हो जाता, तो आने वाले चुनावों में इसके परिणाम बेहद खतरनाक और विनाशकारी हो सकते थे। सत्ता गवाने के इस राजनीतिक डर ने अंततः सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जब जनता का गुस्सा सीमा पार कर जाता है और मीडिया की ढाल काम करना बंद कर देती है, तो सबसे मजबूत कही जाने वाली सरकारों को भी अपने बनाए सिद्धांतों और दावों को पीछे छोड़ना पड़ता है। हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते के अहंकार से लेकर मजबूरी में इस्तीफा लेने तक का यह सफर भारतीय लोकतंत्र की उस ताकत को दिखाता है, जो अंततः जनता के दबाव के आगे सिर झुकाने पर मजबूर करती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी साबित कर दिया है कि मीडिया के सहारे लंबे समय तक वास्तविक मुद्दों को दबाया नहीं जा सकता। युवाओं का आक्रोश, जनप्रतिनिधियों के प्रति बढ़ता असंतोष और सीधे संवाद की अनिवार्यता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता की राजनीति में जनता की आवाज ही अंतिम सत्य होती है। यदि सरकारें समय रहते जन-भावनाओं को नहीं समझतीं, तो उन्हें अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए कड़े और अप्रिय फैसले लेने ही पड़ते हैं।