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21 जुलाई, बंगाल की सियासत का महासमर

केवल एक तारीख नहीं, बल्कि सत्ता के संघर्ष, आंसुओं, संघर्ष और राजनीतिक वर्चस्व का एक जीवंत प्रतीक है। हर साल तृणमूल कांग्रेस इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाती आई है। यह दिन बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने में एक मील का पत्थर रहा है। इस बार का 21 जुलाई शहीद दिवस बंगाल ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति के लिए एक नए संदेश और इम्तिहान का मंच बन गया है।

इस दिवस की जड़ें तीन दशक से भी अधिक पुरानी हैं। 21 जुलाई 1993 को तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के दौरान, कांग्रेस की युवा नेता के तौर पर ममता बनर्जी ने कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग (तत्कालीन सचिवालय) के घेराव का आह्वान किया था। उनकी मुख्य मांग थी कि चुनावों में धांधली रोकने के लिए मतदाताओं के पास सचित्र मतदाता पहचान पत्र होना अनिवार्य किया जाए।

इस शांतिपूर्ण मार्च ने जल्द ही हिंसक रूप अख्तियार कर लिया। पुलिस ने गोलियां चला दीं, जिसमें युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की जान चली गई।  यह घटना ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। बाद में 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, तब वे इस शहादत की भावनात्मक विरासत को अपने साथ ले गईं।

साल 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल के किले को ढहाकर सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने इसे टीएमसी का सबसे बड़ा वार्षिक शक्ति-प्रदर्शन बना दिया। इतिहास में पहली बार, 2026 का यह शहीद दिवस तृणमूल कांग्रेस की एकजुटता के बजाय उसकी आंतरिक फूट की गवाही दे रहा है। एक तरफ ममता बनर्जी का वफादार धड़ा है, तो दूसरी तरफ पार्टी से अलग हुए बागियों और असंतुष्टों का गुट है।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला धड़ा इस बार कोर्ट के आदेश के बाद एक नए स्थान (बिड़ला प्लैनेटेरियम के पास) पर रैली कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ, पार्टी के बागी नेता (जैसे ऋतब्रत बनर्जी व अन्य) और अलग होकर भाजपा के सहयोगी संगठनों से हाथ मिलाने वाले पूर्व सांसद (जैसे काकोली घोष दस्तीदार का गुट) इस विरासत पर अपना अलग दावा ठोक रहे हैं और पृथक रूप से श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं।

इस पूरी लड़ाई में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। प्रदेश कांग्रेस ने इस बार 21 जुलाई की मूल विरासत को फिर से हासिल करने के लिए कमर कस ली है। कांग्रेस का तर्क सीधा और ऐतिहासिक रूप से अकाट्य है कि 1993 का वह आंदोलन युवा कांग्रेस के झंडे तले हुआ था, इसलिए वे 13 शहीद मूल रूप से कांग्रेस के कार्यकर्ता थे।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार के नेतृत्व में कांग्रेस कोलकाता के शहीद मीनार पर अपना अलग भव्य कार्यक्रम आयोजित कर रही है। राज्य में नई सियासी ताकत के रूप में उभरी भाजपा सरकार के लिए यह 21 जुलाई बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण है। प्रशासनिक तैयारियों के पीछे छिपी बेचैनी साफ देखी जा सकती है।

भाजपा यह भली-भांति जानती है कि बंगाल की जनता के मन में ममता बनर्जी के प्रति एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव आज भी मौजूद है।  यदि इस शहीद दिवस पर तमाम आंतरिक फूट, कानूनी पाबंदियों और स्थान परिवर्तन के बावजूद ममता बनर्जी की रैली में भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता है, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका होगा।

जनसमर्थन का संदेश और भाजपा की जीत का रहस्यममता बनर्जी की इस रैली में उमड़ने वाली भीड़ राष्ट्रीय राजनीति के कैनवास पर एक बहुत बड़ा और स्पष्ट संदेश छोड़ेगी। अगर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जनता दीदी के एक आह्वान पर कोलकाता की सड़कों पर उतर आती है, तो यह पूरे देश में इस बात को शीशे की तरह साफ कर देगा कि बंगाल की जनता के बीच ममता बनर्जी की जमीनी लोकप्रियता और उनका करिश्मा आज भी पूरी तरह कायम है।

यह जनसैलाब सीधे तौर पर विपक्ष के इस नैरेटिव को मजबूती देगा कि हालिया चुनाव में भाजपा की जीत के पीछे असली वजह जनता का व्यापक जनसमर्थन या कोई सकारात्मक जनादेश नहीं था, बल्कि इसके पीछे चुनावी जोड़-तोड़, टीएमसी के भीतर पैदा की गई फूट, सरकारी मशीनरी का प्रभाव और रणनीतिक ध्रुवीकरण जैसे अदृश्य कारक सक्रिय थे।

यदि जनता का हुजूम ममता के साथ खड़ा दिखता है, तो भाजपा का यह दावा स्वतः ही खारिज हो जाएगा कि बंगाल की जनता ने तृणमूल की विचारधारा को पूरी तरह नकार दिया है। यह भीड़ देश को बताएगी कि चुनावी हार-जीत के गणित से परे, बंगाल के जनमानस की नब्ज आज भी ममता बनर्जी के हाथों में ही धड़कती है। यही वह डर और बेचैनी है जो भाजपा खेमे को परेशान कर रही है, क्योंकि जनसमर्थन का यह खुला प्रदर्शन उनकी जीत के नैतिक आधार पर गंभीर सवाल खड़े कर देगा।