ईटीएच ज्यूरिक के शोधकर्ताओँ ने धरती पर नई खोज कर दी
धरती पर मौजूद पानी पर ध्यान दिया
मौजूद उल्कापिंडों का अध्ययन किया
जीवन के मूल घटक बाहर से आये
राष्ट्रीय खबर
रांचीः विज्ञान की दुनिया में ईटीएच ज्यूरिक के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नवीनतम और अभूतपूर्व अध्ययन ने हमारी पृथ्वी के जन्म से जुड़ी सदियों पुरानी थ्योरी को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। अब तक खगोल विज्ञान और भू-रसायन विज्ञान में यह एक सर्वमान्य अवधारणा रही थी कि भले ही हमारी पृथ्वी का निर्माण सौर मंडल के भीतरी हिस्से में हुआ हो, लेकिन इसके विकास के दौरान बृहस्पति ग्रह के बाहर यानी बाहरी सौर मंडल से भारी मात्रा में उल्कापिंडों और पदार्थों का आदान-प्रदान हुआ था।
वैज्ञानिक यह मानते रहे हैं कि पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का लगभग 6 से 40 प्रतिशत हिस्सा बाहरी सौर मंडल के उन कार्बन-युक्त और वाष्पशील पदार्थों से आया था, जो अपने साथ पानी और अन्य आवश्यक तत्व लेकर आए थे। इसी सिद्धांत के सहारे वैज्ञानिक पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में महासागरों और पानी के वजूद को समझाते आए हैं।
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हालांकि, ईटीएच ज्यूरिक के ग्रहों के वैज्ञानिकों पालो सोस्सी और डैन बावर द्वारा नेचर एस्ट्रोनॉमी पत्रिका में प्रकाशित इस नए शोध ने इस पुरानी थ्योरी को चुनौती दी है। अपने इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने मंगल ग्रह और वेस्टा जैसे क्षुद्रग्रहों के नमूनों सहित विभिन्न उल्कापिंडों के कुल 10 अलग-अलग समस्थानिक प्रणालियों के डेटा का गहराई से विश्लेषण किया। इससे पहले के वैज्ञानिक अध्ययन आमतौर पर केवल एक या दो आइसोटोप प्रणालियों पर ही केंद्रित हुआ करते थे, लेकिन इस बार शोधकर्ताओं ने एक अनूठे और उन्नत सांख्यिकीय डेटा साइंस मॉडल का उपयोग किया।
इस विस्तृत विश्लेषण के परिणाम बेहद चौंकाने वाले रहे। शोधकर्ताओं ने पाया कि पृथ्वी का निर्माण करने वाले मूल घटक पूरी तरह से एक ही मटेरियल रिजर्वॉयर यानी भीतरी सौर मंडल से आए हैं। बाहरी सौर मंडल के पदार्थों का योगदान पृथ्वी के निर्माण में 2 फीसद से भी कम, या संभवतः शून्य के बराबर है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पृथ्वी का विकास एक अपेक्षाकृत स्थिर और स्थानीय प्रणाली के रूप में हुआ है, जिसमें बाहर से आने वाले पदार्थों की भूमिका नगण्य थी।
इस नए खुलासे ने वैज्ञानिकों के सामने एक बहुत बड़ा और दिलचस्प सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि शुरुआती दौर का भीतरी सौर मंडल अत्यधिक गर्म और शुष्क था, और इसमें बाहरी सौर मंडल का पानी नहीं आया, तो आखिर पृथ्वी पर इतना पानी और महासागर कैसे अस्तित्व में आए? इस खोज ने ब्रह्मांडीय रहस्यों को सुलझाने की दिशा में एक नया दरवाजा खोल दिया है।
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