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संसद में आठ सौ पचास सांसदों पर बहस तेज

भाजपा सरकार के परिसीमन पर बहस के बीच बातचीत

  • दक्षिण भारत में जोरदार विरोध

  • उत्तर भारत का एकाधिकार होगा

  • खर्च और समय में बदलाव निश्चित

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारत में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। केंद्रीय गलियारों में इस बात को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है कि नए संसद भवन की विशाल बैठक क्षमता का उपयोग करते हुए, आगामी समय में लोकसभा सांसदों की कुल संख्या को मौजूदा 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक किया जा सकता है। इस संभावित बदलाव को अमलीजामा पहनाने के लिए एक नए संविधान संशोधन विधेयक के मसौदे पर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं, जिसने देश की राजनीति को दो स्पष्ट धड़ों में बांट दिया है।

सीटों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में तर्क देने वाले राजनेताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम समय की मांग है। उनका कहना है कि पुरानी जनगणना का आधार: वर्तमान में लोकसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना (जब देश की आबादी लगभग 55 करोड़ थी) के आधार पर रुका हुआ है। आज देश की आबादी 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिससे पुराना ढांचा अप्रासंगिक हो गया है। वर्तमान में एक-एक लोकसभा सांसद औसतन 25 लाख से अधिक की आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इतनी बड़ी आबादी की समस्याओं को सुनना और विकास कार्यों को संभालना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। सीटों की संख्या बढ़ने से निर्वाचन क्षेत्रों का आकार छोटा होगा, जिससे जनता और उनके प्रतिनिधि के बीच सीधा संवाद अधिक सुलभ और लोकतांत्रिक हो सकेगा।

दूसरी तरफ, विपक्षी दलों और विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) के क्षेत्रीय दलों ने इस संभावित परिसीमन पर तीव्र आपत्ति जताई है। उनकी मुख्य चिंताएं हैं दक्षिण भारतीय राज्यों का तर्क है कि उन्होंने पिछले दशकों में केंद्र सरकार की नीतियों का पालन करते हुए जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को कड़ाई से लागू किया। अब यदि आबादी को आधार बनाकर सीटें बढ़ाई गईं, तो बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की सीटें आनुपातिक रूप से कम हो जाएंगी। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है। नए परिसीमन से इन राज्यों की लोकसभा सीटों में भारी उछाल आएगा, जिससे केंद्र की सत्ता का संतुलन पूरी तरह उत्तर भारत के पक्ष में झुकने का डर है। विपक्ष इसे भारत के संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती मान रहा है।

राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का कहना है कि सीटों की संख्या 850 करने से केवल क्षेत्रीय असंतुलन ही नहीं, बल्कि संसद के भीतर के प्रबंधन पर भी गहरा असर पड़ेगा। सदन में सदस्यों की संख्या दोगुनी के करीब होने से हर सांसद को अपनी बात रखने के लिए मिलने वाला समय बेहद कम हो जाएगा। इससे संसदीय बहस की गुणवत्ता, विधायी कार्यों की समीक्षा और सरकार की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया को संभालना एक बड़ी चुनौती होगी।

फिलहाल, सरकार का रुख स्पष्ट है कि परिसीमन की यह पूरी प्रक्रिया संवैधानिक दायरे में और पूरी तरह पारदर्शी तरीके से होगी। हालांकि, इस संवेदनशील विषय पर जब तक उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच आम सहमति नहीं बनती, तब तक संसद का यह संभावित विस्तार भारतीय राजनीति में विवाद का एक बड़ा केंद्र बना रहेगा।