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बदलते मौसम में पूरे देश अपनी करनी का फल भोग रहा है

हमने पानी को बहुत हल्के में लिया है

  • जल संरक्षण के प्रति कोई ध्यान नहीं

  • भूजल स्तर को बेहतर करना ही होगा

  • खेती के अलावा पेयजल का भी संकट

राष्ट्रीय खबर

पुणेः भारत इस समय एक महत्वपूर्ण जलवायु चुनौती का सामना कर रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की गति महाराष्ट्र के ऊपर रुक गई है, जिसके चलते देश में बारिश में 41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे मुख्य कारण अल नीनो है। विभाग ने 12 जून को भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर अल नीनो की स्थितियों के बनने की घोषणा की है और अनुमान जताया है कि इस वर्ष मानसून के दौरान ये स्थितियां और मजबूत होंगी।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह चिंता का विषय है। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, भारत इस सीजन में सूखे की दहलीज पर खड़ा है। हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आश्वस्त किया है कि सरकार के पास गेहूं और चावल का पर्याप्त बफर स्टॉक (53.41 मिलियन मीट्रिक टन) मौजूद है, जिससे अकाल की स्थिति की संभावना कम है।

लेकिन चुनौती केवल खाद्यान्न उपलब्धता की नहीं है। गुलाटी चेतावनी देते हैं, यदि कृषि जीडीपी में 1 प्रतिशत की भी गिरावट आती है, तो किसानों की आय पर गहरा असर पड़ेगा। खाद्य मुद्रास्फीति, जो वर्तमान में लगभग 4.8 प्रतिशत है, त्योहारी सीजन (अक्टूबर-नवंबर) तक 5-6 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। जय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक अविक साहा ने कहा कि अल नीनो का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे ग्रामीण जीवन को बाधित करेगा। उन्होंने लंबे समय तक चलने वाले अनुमान और मैपिंग की आवश्यकता पर जोर दिया।

आईएमडी के वरिष्ठ वैज्ञानिक शिवानंद पाई ने कहा कि जून से सितंबर तक मानसून सामान्य से नीचे रहने की उम्मीद है। उन्होंने चेतावनी दी कि 2026 और 2027 के ग्रीष्मकाल अब तक के सबसे गर्म सीजन हो सकते हैं, जहां तापमान 50° सेल्सियस तक जा सकता है। उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के पूर्व प्रोफेसर पार्थ मुखोपाध्याय ने भारत में जल संरक्षण की खराब स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, हम पानी के संचयन में बहुत कमजोर हैं। पुणे और मुंबई जैसे शहरों को जल कटौती का सामना करना पड़ रहा है। हमने बार-बार अनुभव करने के बावजूद अपने जल संसाधनों की रक्षा के लिए उचित रणनीतियां विकसित नहीं की हैं। हमने पानी को बहुत हल्के में लिया है। लिहाजा पेयजल संकट का दायरा पूरे देश में बढ़ता जा रहा है।

आईएमडी के पूर्व महानिदेशक के.जे. रमेश ने बताया कि अल नीनो ही एकमात्र कारक नहीं है। मानसून के उत्तरार्ध में इंडियन ओशन डंपोल की सकारात्मक स्थितियां मानसून को कुछ सहारा दे सकती हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्रों पर अल नीनो का सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है। लेकिन पूरा देश वर्षा जल के संचय की दिशा में सामाजिक प्रयास नहीं कर रहा, जो अत्यंत खतरनाक स्थिति है।