कूटनीतिक मुस्कुराहटों के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई
हाल ही में फ्रांस में संपन्न हुए जी 7 शिखर सम्मेलन की तस्वीरें और फुटेज वैश्विक राजनीति पर नजर रखने वालों के लिए एक गहरा संदेश छोड़ गए हैं। एक ओर जहां द्विपक्षीय बैठकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भविष्य के मधुर संबंधों और व्यापारिक समझौतों की बातें कीं, वहीं दूसरी ओर बॉडी लैंग्वेज (शारीरिक हाव-भाव) कुछ और ही कहानी कह रही थी।
दशकों से चले आ रहे भारत-अमेरिका संबंधों के इतिहास में यह पहली बार है जब कूटनीतिक प्रोटोकॉल की औपचारिकताएं तो निभाई गईं, लेकिन वह गले मिलने वाली गर्मजोशी नदारद थी, जो पिछले कुछ वर्षों में इन दोनों नेताओं की पहचान बन गई थी। दोनों नेताओं ने मंच पर सौहार्द दिखाया, लेकिन पर्दे के पीछे असली मुद्दे अनसुलझे रह गए।
अमेरिकी सेना द्वारा खाड़ी क्षेत्र में भारतीय नाविकों की हत्या का मामला हो या फिर जबरन श्रम के नाम पर भारत पर आयात शुल्क थोपने की अमेरिकी नीति, दोनों ही पक्ष इन पर खुलकर बात करने के बजाय गोल-मोल जवाब देते रहे। प्रधानमंत्री मोदी का जी 7 मंच पर यह कहना कि दुनिया संसाधनों की नहीं, बल्कि भरोसे की कमी से जूझ रही है, स्पष्ट संकेत था कि भारत-अमेरिका के बीच विश्वास का संकट गहरा गया है।
इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच एक बेहद गंभीर घटनाक्रम सामने आया। अमेरिका की एक सैन्य कमांड द्वारा जारी किए गए नए मानचित्र में कश्मीर को भारत का हिस्सा न दिखाकर उसे पाकिस्तान का हिस्सा दर्शाया गया है। यह मात्र एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के प्रति अमेरिकी प्रशासन के दृष्टिकोण पर एक बड़ा सवालिया निशान है। यह मानचित्र तब जारी किया गया जब दोनों देश रणनीतिक साझेदारी की बातें कर रहे हैं। भारत के लिए यह कूटनीतिक अपमान से कम नहीं है, लेकिन आधिकारिक तौर पर भारत सरकार ने इस पर अभी कोई सख्त रुख नहीं अपनाया है, जो आश्चर्यजनक है।
इसी बीच, अमेरिका में भारतीय तिरंगे को जलाए जाने का वीडियो सार्वजनिक होना आग में घी डालने जैसा है। राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए असहनीय होता है। आश्चर्य यह है कि तीन भारतीय नाविकों की दुखद मौत पर सरकार की जो चुप्पी थी, वही चुप्पी तिरंगे के अपमान के मामले में भी दिखाई दे रही है।
यह चुप्पी क्या कूटनीतिक विवशता है या कोई सोची-समझी रणनीति, यह आम नागरिकों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। देश के भीतर इस स्थिति पर राजनीतिक पारा गर्म है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उनका यह तर्क कि “भारतीय प्रधानमंत्री अब अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने मुंह खोलने की स्थिति में नहीं हैं,” एक गंभीर आरोप है।
राहुल गांधी का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका पर अपनी निर्भरता इतनी अधिक बढ़ा ली है कि अब हमारे पास अपनी बात मजबूती से रखने का साहस नहीं बचा है। विपक्ष का यह हमला केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि उन लाखों भारतीयों की चिंता का प्रतिनिधित्व है जो देश के स्वाभिमान को सर्वोच्च मानते हैं। यह स्पष्ट है कि भारत और अमेरिका के संबंध आज एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां कूटनीतिक चमक-धमक तो है, लेकिन रिश्तों की बुनियाद में दरारें पड़ चुकी हैं।
अमेरिका की अमेरिका फर्स्ट नीति और भारत की आत्मनिर्भर होने की आकांक्षा के बीच एक अंतर्निहित संघर्ष है। अगर भारत अपनी संप्रभुता, अपने वीर नाविकों के बलिदान और राष्ट्रीय सम्मान के मुद्दों पर अमेरिकी प्रशासन के साथ दृढ़ता से बातचीत नहीं करता है, तो यह आने वाले समय के लिए एक खतरनाक नजीर बन सकता है।
किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का आधार उसका आत्मसम्मान होता है। भविष्य में यदि इन संबंधों को वास्तविक रणनीतिक साझेदारी में बदलना है, तो दोनों देशों को आपसी भरोसे को फिर से बहाल करना होगा। केवल मुस्कुराकर हाथ मिला लेने से या भविष्य की सुनहरी बातों से वर्तमान की कड़वाहट और विवादों को नहीं मिटाया जा सकता।
अब समय आ गया है कि भारत कूटनीतिक शालीनता के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कठोर वार्ताकार की भूमिका में वापस लौटे, जैसा कि खुद ट्रंप ने मोदी को संबोधित किया था। यदि भारत ने समय रहते अपने रुख को स्पष्ट नहीं किया, तो यह न केवल हमारे कूटनीतिक कद को कम करेगा, बल्कि देश के नागरिकों में भी सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करेगा। इसके अलावा यह भी समझने लायक बात है कि जब दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच संबंध बिगड़ जाते हैं तो पूरे देश पर इसका असर साफ दिखाई पड़ता है। पूर्व के अनुभवों से भारत को यह मान लेना चाहिए कि दरअसल अमेरिका एक व्यापारी देश है जो हमेशा अपने हितों की बात सोचता है।