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विकास की अंधी दौड़ में दांव पर पर्यावरण

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा 81,000 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत 13,000 करोड़ रुपये के नए ग्रीनफील्ड सिविल-मिलिट्री हवाई अड्डे को मंजूरी दी गई है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य के करीब बनने वाला यह प्रोजेक्ट सुरक्षा के लिहाज से जितना अहम बताया जा रहा है, पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों के दृष्टिकोण से उतना ही विवादित हो चुका है।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस परियोजना को लेकर सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि यदि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन के लिए आईएनएस बाज़ नौसैनिक हवाई क्षेत्र का विस्तार करना चाहती है, तो कांग्रेस इसका पूरा समर्थन करेगी।

लेकिन सुरक्षा की आड़ में वहां कैसिनो, आलीशान होटल और व्यापारिक हब बनाने के लिए लाखों प्राचीन पेड़ों को काटना इस बेहद संवेदनशील द्वीप के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को ऐसा जख्म देगा, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी। राहुल गांधी का यह बयान इस चिंता को रेखांकित करता है कि देश की सुरक्षा प्राथमिक होनी चाहिए, न कि चुनिंदा पूंजीपतियों के व्यावसायिक लाभ।

उन्होंने आशंका जताई थी कि जंगल की बेशकीमती लकड़ियों को काटकर और बेचकर वहां अमीरों के लिए आरामगाह, जुआघर (कैसिनो) और रिसॉर्ट्स खड़े किए जाएंगे। यह पूरी कवायद स्थानीय गरीब आदिवासियों और विशेष रूप से संकटग्रस्त शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर देगी।

स्थानीय आबादी को विस्थापित कर कॉरपोरेट घरानों के लिए रास्ता साफ करना किसी भी तरह से देश हित में नहीं कहा जा सकता। दिलचस्प बात यह है कि इस राजनीतिक और सामाजिक विरोध के बीच सरकार ने जो नया फैसला लिया है, उसमें आईएनएस बाज़ के विस्तार की योजना को पूरी तरह छोड़ दिया गया है। तकनीकी और भौगोलिक चुनौतियों का हवाला देते हुए अब एक बिल्कुल नया ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा बनाने के लिए बजट आवंटित किया जा चुका है।

लेकिन पर्यावरणविदों का मानना है कि इस नए निर्माण से भी बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और जैव विविधता का नुकसान तय है। ग्रेट निकोबार का संकट कोई इकलौती घटना नहीं है। आज पूरा देश गंभीर जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। दिल्ली-एनसीआर की जीवनरेखा मानी जाने वाली अरावली पर्वत श्रृंखला को अवैध खनन और रियल एस्टेट लॉबी ने खोखला कर दिया है। अरावली के जंगल जो कभी मरुस्थलीकरण को रोकने और भूमिगत जल स्तर को बनाए रखने का काम करते थे, वे अब कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रहे हैं।

दूसरी ओर, हिमालयी क्षेत्र से लगातार भयावह चेतावनियां मिल रही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में चार धाम ऑल-वेदर रोड और बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के लिए पहाड़ों को अंधाधुंध ब्लास्ट करके तोड़ा गया और लाखों पेड़ काटे गए। इसका नतीजा हम जोशीमठ के धंसने, केदारनाथ की त्रासदी और हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ व भूस्खलन के रूप में देख रहे हैं।

प्रकृति हमें बार-बार सचेत कर रही है कि नाजुक पहाड़ी और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ खिलवाड़ के परिणाम कितने घातक हो सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि इन स्पष्ट चेतावनियों के बावजूद देश के कई अन्य राज्यों में भी विकास परियोजनाओं के नाम पर धड़ल्ले से जंगलों की बलि दी जा रही है। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला खनन के लिए प्राचीन वनों की कटाई का आदिवासियों ने पुरजोर विरोध किया, लेकिन उनकी आवाज़ को दबा दिया गया।

इसी तरह मध्य प्रदेश के बक्सवाहा में हीरों के खनन के लिए और मुंबई के आरे कॉलोनी में मेट्रो कार शेड के लिए हजारों पेड़ों को काटा गया। इन तमाम राज्यों में वनों के इस विनाश से क्षेत्रीय इकोसिस्टम पूरी तरह बिगड़ चुका है। जंगलों के कटने से गर्मियों में तापमान रिकॉर्ड तोड़ (50 डिग्री सेल्सियस के पार) हो रहा है, तो वहीं बारिश के पैटर्न में खतरनाक बदलाव आया है।

वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होने से वे भोजन और पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों का रुख कर रहे हैं, जिससे आए दिन जान-माल का नुकसान हो रहा है। निकोबार की मेगा प्रोजेक्ट को दी गई मंजूरी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम विकास की उस अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं जहाँ पर्यावरण केवल एक दोयम दर्जे का विषय बनकर रह गया है?

सुरक्षा के नाम पर शुरू होने वाली परियोजनाएं जब अंततः कमर्शियल टूरिज्म और अमीरों के मनोरंजन केंद्रों में बदल जाती हैं, तो वह न केवल स्थानीय गरीबों और आदिवासियों के साथ अन्याय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है। भारत को यदि वास्तव में महाशक्ति बनना है, तो उसे सतत विकास के मॉडल को अपनाना होगा। सुरक्षा और आर्थिक प्रगति आवश्यक है, लेकिन वह अरावली, हिमालय और निकोबार के जंगलों को मरुस्थल बनाकर हासिल नहीं की जा सकती।