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ट्रंप ने अपने मित्रों पर फिर नये टैरिफ लगाये

इस बार जबरन श्रम संबंधी चिंताओँ का हवाला दिया

  • माहौल से अमेरिकी श्रमिकों को तकलीफ

  • ट्रंप का पुराना फैसला अदालत में रद्द हुआ

  • भारत पर दबाव डालने की कूटनीति है यह

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः अमेरिका ने लगभग अपने सभी आयात वाले देशों पर 10 प्रतिशत से 12.5 फीसद तक के नए शुल्क (टैरिफ) लगाने की घोषणा की है। यह कदम इन चिंताओं के कारण उठाया गया है कि ये देश जबरन श्रम की समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन द्वारा फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके पिछले कई शुल्कों को रद्द किए जाने के बाद से नए आयात करों की घोषणा करने का यह दूसरा अवसर है।

अमेरिकी व्यापार विभाग का कहना है कि इन देशों को इन शुल्कों का सामना करना पड़ेगा क्योंकि वे जबरन श्रम से बनी वस्तुओं के आयात को रोकने में विफल रहे हैं। इस सूची में शामिल 60 व्यापारिक साझेदारों में ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, कनाडा, भारत और जापान शामिल हैं, जो अमेरिका को बेचे जाने वाले लगभग सभी सामानों के लिए जिम्मेदार हैं।

अमेरिकी सरकार का मानना है कि उन देशों के साथ व्यापार करना अनुचित है जो जबरन श्रम से बनी चीजें खरीदते हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने कहा कि यह एक ऐसी गतिशीलता पैदा करता है जहां अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक स्तर पर एक असमान मैदान पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। प्रस्तावित टैरिफ मार्च में ग्रीयर द्वारा शुरू की गई जांच के बाद आए हैं। जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि 54 देशों ने जबरन श्रम से आंशिक या पूर्ण रूप से उत्पादित वस्तुओं के आयात पर कानूनी प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता दिखाई है।

छह अन्य व्यापारिक साझेदारों – कनाडा, यूरोपीय संघ, इक्वाडोर, इंडोनेशिया, मैक्सिको और पाकिस्तान – के बारे में कहा गया कि वे जबरन श्रम आयात निषेध को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रहे हैं। व्यापार विभाग ने कहा कि वह कनाडा, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, इंडोनेशिया, मैक्सिको, पाकिस्तान, अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, अल साल्वाडोर, ग्वाटेमाला, मलेशिया और ताइवान से होने वाले आयात पर 10% शुल्क लगाएगा। चीन और भारत सहित शेष 45 देशों को 12.5% शुल्क का सामना करना पड़ेगा।

दूसरी ओर, ब्रिटेन ने कहा है कि वह जबरन श्रम से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है, चीन ने आरोपों से इनकार किया है और यूरोपीय संघ ने इन शुल्कों को अनुचित करार दिया है। वहीं, एक भारतीय विश्लेषक ने इस कदम को एक दबाव की रणनीति बताया है।