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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विधेयक पर हस्ताक्षर किया

रूसी तेल की खरीद के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध का फैसला

वाशिंगटनः वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस प्रतिबंध से जुड़े एक बेहद कड़े और व्यापक विधेयक को आधिकारिक तौर पर कानून के रूप में मंजूरी दे दी है। इस नए और सख्त कदम के लागू होने से उन तमाम देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया है, जो रूस से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद जारी रखे हुए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के इस बड़े फैसले के बाद दुनिया की दो प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं—भारत और चीन—सीधे तौर पर अमेरिकी प्रतिबंधों और भारी-भरकम शुल्कों की चपेट में आने के कगार पर खड़ी हो गई हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप की यह महत्वपूर्ण मंजूरी रिपब्लिकन पार्टी के नेतृत्व वाली प्रतिनिधि सभा द्वारा इस व्यापक प्रतिबंध विधेयक को 262-159 के स्पष्ट बहुमत से पारित किए जाने के ठीक दो दिन बाद सामने आई है। इस कड़े कानून का आधिकारिक नाम ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ रखा गया है। इस कानून का नामकरण वाशिंगटन में यूक्रेन के सबसे मुखर और प्रबल समर्थकों में से एक रहे दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम की याद में किया गया है, जिनका इस वर्ष जुलाई में कीव की एक यात्रा से लौटने के तुरंत बाद निधन हो गया था।

इस नवनिर्मित कानून का प्राथमिक और सबसे बड़ा उद्देश्य रूस के सैन्य अभियानों और यूक्रेन के खिलाफ जारी उसके युद्ध प्रयासों को मिल रही वित्तीय सहायता को पूरी तरह से कमजोर करना और बाधित करना है। इसके तहत सीधे तौर पर उन रूसी अधिकारियों, प्रमुख बैंकों, ऊर्जा हितों और उन विदेशी संस्थाओं को निशाना बनाया गया है जो मॉस्को के सैन्य अभियानों का समर्थन कर रहे हैं।

अमेरिकी संसद की हाउस वेज एंड मीन्स कमेटी के अनुसार, यह कानून अमेरिकी प्रशासन को रूसी सामानों पर 500 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाने का निर्देश देने का अधिकार देता है। इसके साथ ही, रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों के लिए भी यह प्रावधान किया गया है कि यदि वे मॉस्को से ऊर्जा आयात जारी रखते हैं, तो उनके उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया जा सकता है।

इस विधेयक में एक विशेष संशोधन के जरिए भारत सहित कुल 10 देशों—चीन, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), तुर्किये, सिंगापुर, अजरबैजान, कजाकिस्तान, हंगरी, किर्गिस्तान और स्लोवाकिया—को इसके द्वितीयक टैरिफ प्रावधानों के दायरे में स्पष्ट रूप से नामित करने का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि, यह संशोधन अपने आप में स्वचालित रूप से भारत या अन्य देशों पर 100 प्रतिशत शुल्क नहीं लगाता है, लेकिन यह अमेरिकी राष्ट्रपति को असीमित शक्ति प्रदान करता है कि वे जब चाहें इस अधिकार का उपयोग कर सकते हैं।

इस वैश्विक भू-राजनीतिक हलचल और अमेरिकी टैरिफ की तलवार लटकने के बाद भारत सरकार ने अपना रुख बेहद स्पष्ट कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर दो टूक शब्दों में कहा है कि देश अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। भारत विविध स्रोतों से ऊर्जा आपूर्ति प्राप्त करने और बदलते वैश्विक बाजार के रुझानों के आधार पर आवश्यक कदम उठाना जारी रखेगा।

मंत्रालय ने यह भी जानकारी दी कि रूस के साथ भारत के तेल व्यापार से जुड़े मुद्दों को हाल के महीनों में विभिन्न अमेरिकी वार्ताकारों के समक्ष उच्च स्तर पर बहुत स्पष्ट रूप से उठाया गया है। भारत ने अमेरिकी पक्ष को यह भली-भांति समझा दिया है कि इस तरह के एकतरफा कदमों का न केवल द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार व्यवस्था पर क्या दूरगामी और प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।