Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Sonipat Firing Case: देवीलाल कॉलोनी में गोलियों की गूंज; वर्चस्व की लड़ाई में युवकों ने की ताबड़तोड़... Indore Voter ID Update: इंदौर में मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या सुधार का आखिरी मौका; जानें क्या है ... MP PWD Transfer News: मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग में बड़े तबादले, प्रभारी मुख्य अभियंताओं को मिली ... MP UCC Meeting: UCC समीक्षा बैठक में सीएम मोहन यादव का सख्त अंदाज; दतिया कलेक्टर-एसपी को लगाई फटकार Katni Bus Accident: कटनी में भीषण सड़क हादसा; हाइवा से टकराकर पलटी बस, 5 लोगों की मौत और कई घायल Satna Nagod Firing Case: राजघराने के गोलीकांड में नया मोड़; पुलिस चौकी में आरोपी महिला को मिला VIP ट्... Instagram Fake Profile Case: इंस्टाग्राम पर रईस दिखने वाला निकला पुताई करने वाला मजदूर; कॉलेज छात्रा... Garra Bridge Controversy: बालाघाट में बना 'क्रिकेट बैट' जैसा रेलवे ओवरब्रिज; गायब हुआ फुटपाथ, मचा हड़... MP Police Suicide Case: मध्य प्रदेश में पुलिसकर्मियों में बढ़ रहा तनाव; 12 दिनों में 5 जवानों ने की आ... MP Police Suicide Case: मध्य प्रदेश में पुलिसकर्मियों में बढ़ रहा तनाव; 12 दिनों में 5 जवानों ने की आ...

भारतीय चुनाव आयोग की साख का सवाल

पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भारतीय चुनाव आयोग द्वारा निभाई गई भूमिका को लेकर देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बेहद तीखी बहस छिड़ी हुई है। इस विवाद के बीच, चुनाव आयोग के शीर्ष सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने वाले मौजूदा कानून की वैधता खुद देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायिक दायरे और समीक्षा के अधीन आ गई है।

सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में याचिकाओं के एक ऐसे समूह पर विस्तार से सुनवाई कर रहा है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है। इस पूरे मामले की संवेदनशीलता को समझने के लिए इसके कानूनी इतिहास पर नज़र डालना आवश्यक है।

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक और युगांतकारी फैसला सुनाया था। अदालत ने आदेश दिया था कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति एक उच्च स्तरीय त्रिपदीय समिति की सलाह पर की जानी चाहिए। इस प्रस्तावित समिति में देश के प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यह अंतरिम व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक कि संसद इस विषय पर कोई स्वतंत्र और ठोस कानून नहीं बना लेती।

संसद ने अदालत के इस फैसले के बाद, उसी वर्ष यानी दिसंबर 2023 में एक नया कानून (अधिनियम) पारित किया। हालाँकि, इस नए कानून को बनाते समय संसद ने चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को पूरी तरह से बाहर कर दिया। इसके बजाय, नए कानून के तहत बनाई गई तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के साथ-साथ प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया।

तभी से यह चयन विवादों के घेरे में आ गया क्योंकि जो लोग चुने गये उनकी कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न उठे। संसद द्वारा बनाए गए इस नए कानून की संरचना को देखने से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि यह व्यवस्था सीधे तौर पर देश की कार्यपालिका को एकतरफा बढ़त और वर्चस्व प्रदान करती है। तीन सदस्यों की इस समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा ही मनोनीत कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं, जिसका सीधा मतलब यह है कि बहुमत हमेशा सत्ता पक्ष के पास रहेगा।

ऐसी स्थिति में, यदि लोकसभा में विपक्ष का नेता समिति के किसी फैसले या किसी नाम पर अपनी असहमति भी दर्ज कराता है, तो भी कार्यपालिका के पास अपने पसंदीदा नाम को बहुमत के आधार पर आगे बढ़ाने और नियुक्त करने की पूरी शक्ति होती है। वर्तमान परिदृश्य में यह मुद्दा इसलिए भी अधिक प्रासंगिक हो गया है क्योंकि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर पूरा विपक्ष चुनाव आयोग पर लगातार हमलावर है और उस पर पक्षपात करने के गंभीर आरोप लगा रहा है।

देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को अक्षुण्ण रखने के लिए यह बेहद आवश्यक और अपरिहार्य हो गया है कि इन शीर्ष संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों के लिए एक अत्यंत पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय तंत्र विकसित किया जाए। भारतीय संविधान के तहत चुनाव आयोग की पूर्ण स्वतंत्रता एक बुनियादी और अनिवार्य जनादेश है।

चुनाव आयोग पूरे देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव तभी संपन्न करा सकता है, जब उसे कार्यपालिका के किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप, राजनीतिक दबाव और प्रभाव से पूरी तरह से सुरक्षित रखा जाए। वर्तमान अदालती सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि उसके 2023 के फैसले का उद्देश्य संसद को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने के लिए मजबूर करना या नियम तय करना नहीं था, क्योंकि कानून बनाने का संप्रभु अधिकार विधायिका के पास ही है।

अतः, अब यह पूरी जिम्मेदारी देश की विधायिका पर है कि वह खुद आगे बढ़कर पहल करे और इस अधिनियम में आवश्यक संशोधन करे। इस समय दांव पर केवल किसी कानून की वैधता नहीं है, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग की वैश्विक साख, उसकी स्वतंत्रता और अंततः हमारे जीवंत चुनावी लोकतंत्र का स्वास्थ्य दांव पर लगा हुआ है।

सरकार द्वारा अक्सर चर्चा में लाए जाने वाले एक राष्ट्र, एक चुनाव जैसे बड़े और व्यापक सुधारों को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है और वे इंतजार कर सकते हैं; लेकिन इस समय देश की सबसे पहली प्राथमिकता चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को विसंगतियों और कमियों से पूरी तरह मुक्त बनाना होना चाहिए, ताकि नागरिकों का अटूट विश्वास सदैव बना रहे। वरना अचानक से अज्ञात स्रोतों से निकलने वाले तेलचट्टे इस व्यवस्था को ही चुनौती देने लगेंगे।