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सुप्रीम कोर्ट ने विचार का उपरांत अपना बड़ा फैसला सुनाया

सरकारी कर्मचारी को पदोन्नति मांगने का हक नहीं

  • नियम बदला है तो वही लागू रहेगा

  • प्रोन्नति में मनमानी कतई नहीं चलेगी

  • उच्च न्यायालय के बाद यहां मामला आया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों के पास केवल इस आधार पर पुरानी सेवा नियमावली के तहत पदोन्नति मांगने का कोई निहित अधिकार नहीं है कि नई नियमावली आने से पहले रिक्तियां उत्पन्न हो चुकी थीं।अदालत ने कहा कि सरकार किसी भी चरण में नई सेवा नियमावली लाकर चयन और पदोन्नति की पद्धति, मानदंड या प्रक्रिया को बदलने के लिए पूरी तरह सक्षम है, बशर्ते कि वे बदलाव मनमाने न हों।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले की अपीलों पर सुनवाई की। यह विवाद ओडिशा के राज्य परिवहन विभाग के दो कर्मचारियों (दाश और साहू) से जुड़ा था, जो कनिष्ठ स्तर पर भर्ती हुए थे और बाद में वरिष्ठ स्तर पर पदोन्नत हुए थे।

वे सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी के पद पर पदोन्नति की मांग कर रहे थे। यह रिक्ति 1981 के पुराने कार्यकारी निर्देशों के लागू रहने के दौरान आई थी, जिसके तहत ग्रेड-I सहायक के पद पर 5 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी योग्यता और उपयुक्तता के आधार पर इस पद के लिए पात्र थे।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक बुलाए और पुरानी व्यवस्था के तहत इन कर्मचारियों की पदोन्नति पर विचार करे। साथ ही, हाईकोर्ट ने नई भर्ती प्रक्रिया के तहत इन रिक्तियों को भरने पर रोक लगा दी थी।
राज्य सरकार ने दलील दी कि सिर्फ पुराने नियमों के समय रिक्ति आने से कर्मचारियों को पदोन्नति का कोई पक्का अधिकार नहीं मिल जाता। सरकार के पास कैडर के पुनर्गठन और चयन के तरीके को बदलने का पूरा अधिकार है।

पदोन्नति प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही, ओडिशा सरकार ने 2017 में कैडर का पुनर्गठन कर दिया। हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए और राज्य सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए, न्यायमूर्ति दत्ता द्वारा लिखे गए निर्णय में कहा गया कि ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है कि रिक्तियों को अनिवार्य रूप से उसी तिथि पर मौजूद नियमों के तहत भरा जाए जिस दिन वे उत्पन्न हुई थीं।

अदालत ने साफ किया कि केवल इसलिए कि पुराने नियम अनुभव के आधार पर पदोन्नति के दावे का समर्थन करते थे, कर्मचारियों को कोई निहित अधिकार या वैध अपेक्षा नहीं मिल जाती। कर्मचारी के पास पदोन्नत होने का कोई निहित या वैध अधिकार नहीं होता है।