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गोलमाल है भाई सब गोलमाल है

आज की राजनीति वह अनसुलझी पहेली है, जिसे सुलझाने बैठो तो खुद पहेली बन जाओ। अगर भारतीय राजनीति को एक मल्टी-स्टारर फिल्म माना जाए, तो फिलहाल इसके दो सबसे बड़े सेट—पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु—पर ऐसी गोलमाल चल रही है कि निर्देशक भी अपनी स्क्रिप्ट फाड़कर संन्यास लेने की सोच रहा है।

सबसे पहले चलते हैं सोनार बांग्ला की ओर, जहाँ चुनावी नतीजे आने के बाद भी खेल खत्म नहीं होता। यहाँ लोकतंत्र का ऐसा डिजिटल अवतार देखने को मिला कि कंप्यूटर बाबा ने एक झटके में लाखों लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया। इसे कहते हैं लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी। मतलब, आप जीवित हैं, आपके पास आधार है, राशन कार्ड है, लेकिन कंप्यूटर कहता है कि आप लॉजिकली फिट नहीं बैठ रहे।

फिर आते हैं हमारे ट्रिब्यूनल वाले जज साहब। उन्होंने जब फाइलें खोलीं, तो पता चला कि चुनाव आयोग ने जितने नाम जोड़े नहीं थे, उससे ज्यादा उन्होंने अकेले ही बहाल कर दिए। यह तो वही बात हुई कि अंपायर ने जिसे आउट दिया, थर्ड अंपायर ने उसे न केवल नॉट आउट दिया बल्कि एक्स्ट्रा रन भी दे दिए। इसके बाद जज साहब ने इस्तीफा दे दिया—शायद यह सोचकर कि इस लॉजिक के चक्कर में कहीं उनका अपना ही डेटा डिलीट न हो जाए।

अब दक्षिण की ओर मुड़िए, जहाँ राजनीति नहीं, शुद्ध सिनेमा चल रहा है। तमिलनाडु में गठबंधन टूटने की रफ्तार वैसी ही है जैसे किसी फास्ट एंड फ्यूरियस फिल्म की कार। अन्नाद्रमुक ने भाजपा से ऐसे नाता तोड़ा, जैसे कोई पुराना प्रेमी अचानक अपनी सगाई की अंगूठी वापस कर दे। लेकिन असली ट्विस्ट तो कांग्रेस ने दिया। वर्षों तक डीएमके के साथ मेड फॉर ईच अदर वाला रिश्ता निभाने वाली कांग्रेस ने अचानक सुपरस्टार विजय की टीवीके के साथ नैन-मटक्का शुरू कर दिया। स्टालिन साहब हैरान हैं कि जिस इंडिया गठबंधन की कसम खाकर उन्होंने भाजपा को कोसा था, उसी गठबंधन के साथी ने उनके घर में ही सेंध लगा दी।

इसी बात पर फिल्म गोलमाल का यह टाईटल सॉंग याद आ रहा है। इसे लिखा था गुलजार ने और संगीत में ढाला था आर डी बर्मन ने। इसे किशोर कुमार और सपन चक्रवर्ती ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है
सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है

सीधे रस्ते की चाल देखो कैसी टेढ़ी है

सीधे रस्ते की चाल देखो कैसी टेढ़ी है

ये तो चक्कर के ऊपर चक्कर की सीढ़ी है

ये तो चक्कर के ऊपर चक्कर की सीढ़ी है

चक्कर है भाई, सब गोलमाल है

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है

देख कर नज़रों को ये धोखा लगता है

देख कर नज़रों को ये धोखा लगता है

सारा का सारा ये आलम चोखा लगता है

सारा का सारा ये आलम चोखा लगता है

पर धोखेबाज़ है भाई, सब गोलमाल है

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है

सच सुनो, सच तो है के सच बोलना पाप है

सच सुनो, सच तो है के सच बोलना पाप है

बेटे से बढ़ के यहाँ आज-कल बाप है

बेटे से बढ़ के यहाँ आज-कल बाप है

रिश्ते जाल है भाई, सब गोलमाल है

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है

जिस को देखो वो ही यहाँ हाथ मारता है

जिस को देखो वो ही यहाँ हाथ मारता है

अपनी तो जीत है पर सब हारता है

अपनी तो जीत है पर सब हारता है

कंगाल है भाई, सब गोलमाल है

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है

सीधे रस्ते की चाल देखो कैसी टेढ़ी है

ये तो चक्कर के ऊपर चक्कर की सीढ़ी है

चक्कर है भाई, सब गोलमाल है

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है

सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है…

पूरे देश की राजनीति अब उस स्मार्ट ग्लाइड बम (तारा) की तरह हो गई है, जिसे लॉन्च कहीं से किया जाता है और वह गिरता कहीं और है। बंगाल में एल्गोरिदम का बम गिरा, तो तमिलनाडु में सुपरस्टार का। जनता बेचारी मनरेगा के उन मजदूरों की तरह है, जिनका नाम रजिस्टर में तो बढ़ रहा है, लेकिन हाथ में काम (और जेब में दाम) घट रहा है। नेताओं के लिए राजनीति एक म्यूजिकल चेयर का खेल है। संगीत बजता है, तो सब साथ नाचते हैं; संगीत रुकता है, तो जो हाथ लगा उस कुर्सी पर बैठ जाते हैं। कोई विचारधारा नहीं, कोई सिद्धांत नहीं—बस कुर्सी सलामत रहे।

अंत में, अगर आप आज के भारत का राजनीतिक नक्शा देखें, तो वह किसी टेढ़े-मेढ़े एब्सट्रैक्ट आर्ट जैसा दिखेगा। कहीं ट्रिब्यूनल से जज गायब हैं, कहीं गठबंधन से साथी गायब हैं, और कहीं-कहीं तो मतदाता ही गायब हैं। गुलजार साहब ने ठीक ही लिखा था— सीधे रस्ते की चाल देखो कैसी टेढ़ी है।। आज की राजनीति में रास्ता सीधा हो या टेढ़ा, मंज़िल सिर्फ एक है—सत्ता।