बाइक पर आने जाने के प्रतिबंध में ढील
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः चुनाव आयोग ने मंगलवार देर रात जारी एक नए आदेश में मतदान से दो दिन पहले दोपहिया वाहनों पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को आंशिक रूप से वापस ले लिया है। इस संशोधन के बाद अब ऐप-आधारित बाइक सेवाओं, फूड डिलीवरी राइडर्स और दफ्तर जाने वाले लोगों को पीछे सवारी बिठाकर चलने की अनुमति दे दी गई है। यह राहत उन राज्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जहाँ 23 अप्रैल को मतदान होना है।
आयोग द्वारा जारी औपचारिक अधिसूचना के अनुसार, मतदान के दो दिन पहले से लेकर मतदान के दिन तक ओला, उबर, जोमैटो और स्विगी जैसी सेवा प्रदाताओं को प्रतिबंधों से मुक्त रखा गया है। इसके अलावा, आपातकालीन सेवाओं और पारिवारिक कार्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले दोपहिया वाहनों को भी छूट दी गई है। पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिला निर्वाचन अधिकारियों और पुलिस को स्पष्ट निर्देश भेजे हैं कि इन सेवाओं से जुड़े कर्मियों को रोका न जाए।
पहचान पत्र और नियम राहत मिलने के बावजूद, चुनाव आयोग ने सुरक्षा के मद्देनजर कुछ शर्तें भी लागू की हैं। छूट की श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक मोटरसाइकिल चालक के पास संबंधित सेवा प्रदाता या नियोक्ता द्वारा जारी वैध पहचान पत्र होना अनिवार्य है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों या पुलिस द्वारा मांग किए जाने पर उन्हें यह पहचान पत्र प्रस्तुत करना होगा। आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये राइडर्स केवल एक सवारी या एजेंसी द्वारा प्रदान की गई खाद्य सामग्री ही ले जा सकते हैं।
अदालती चुनौती और आयोग का तर्क इससे पहले, चुनाव आयोग ने मतदान से दो दिन पहले शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक बाइक के आवागमन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। आयोग का तर्क था कि मोटरसाइकिलों का उपयोग अक्सर मतदाताओं को डराने-धमकाने के उपकरण के रूप में किया जा सकता है। हालाँकि, इस प्रतिबंध को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि दोपहिया वाहन दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और कार जैसे विकल्प या तो दुर्लभ हैं या आम आदमी के लिए बेहद महंगे हैं।
अदालत ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और इस पर आगे सुनवाई करेगी। हालांकि, आयोग के नए आदेश ने पहले ही उन हजारों डिलीवरी पार्टनर्स और कामकाजी लोगों को बड़ी राहत पहुँचाई है जिनका रोजगार और आवागमन पूरी तरह से बाइक पर निर्भर है। इस कदम को निष्पक्ष चुनाव और आम जनता की सुविधा के बीच संतुलन बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।