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Pahalgam Attack: पहलगाम हमले के एक साल बाद भी बैसरन घाटी में जिंदा है खौफ, गोलियों की गूंज से अब तक नहीं उबरे पीड़ित परिवार

पहलगाम… सिर्फ यह नाम सुनते ही रूह कांप उठती है. एक तरफ दुख, तो दूसरी तरफ गुस्सा है. ये ऐसे जज्बात हैं जो पीड़ित परिवारों को पूरी तरह से जकड़ लेते हैं. पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए इस हमले ने कई परिवारों को तोड़कर रख दिया. एक साल बीत जाने के बाद भी उस आतंकी हमले की यादें आज तक लोगों के दिलों में जख्म बनकर जिंदा हैं. यह हमला सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए एक ऐसा सदमा है, जिससे उबर पाना आज भी मुश्किल साबित हो रहा है.

हमले के वक्त घाटी में मौजूद पर्यटक प्रकृति की खूबसूरती का आनंद ले रहे थे. कोई तस्वीरें ले रहा था, तो कोई अपने परिवार के साथ सुकून के पल बिता रहा था. लेकिन अचानक आई गोलियों की आवाज ने इस सुकून को चीख-पुकार में बदल दिया. आतंकवादियों ने बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें खासतौर पर पुरुषों को निशाना बनाया गया. कई महिलाओं ने अपनी आंखों के सामने अपने पतियों और बेटों को खो दिया, एक ऐसा दृश्य, जिसे वे आज भी भूल नहीं पाई हैं.

68 वर्षीय चंद्रमौली पत्नी के साथ गए थे पहलगाम

इन पीड़ितों में विशाखापत्तनम के 68 वर्षीय चंद्रमौली भी शामिल थे. एक रिटायर्ड वरिष्ठ बैंक अधिकारी, जो अपनी पत्नी नागमणि के साथ कश्मीर घूमने गए थे. यह यात्रा उनके लिए खुशियों से भरी यादें बनाने का मौका थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. 18 अप्रैल को चंद्रमौली अपने दोस्तों और उनके परिवारों के साथ कश्मीर यात्रा पर निकले थे. उन्होंने डल झील में शिकारा की सवारी की, ट्यूलिप गार्डन की खूबसूरती देखी और केबल कार का आनंद लिया. हर दिन खुशियों से भरा था और हर पल को उन्होंने कैमरे में कैद किया.

दया की गुहार लगाने के बाद भी मार दी गोली

22 अप्रैल को वे पहलगाम पहुंचे, जिसे मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है. वहां से घोड़ों के जरिए वे बैसरन घाटी तक गए. दोपहर करीब 1 बजे, जब सब कुछ सामान्य लग रहा था, तभी अचानक फायरिंग शुरू हो गई. चंद्रमौली उस समय वॉशरूम से लौट रहे थे. जैसे ही उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी, उन्होंने जान बचाने के लिए भागने की कोशिश की. दिल की बीमारी से जूझ रहे होने के बावजूद उन्होंने बाड़ पार करने की कोशिश की, लेकिन आतंकवादियों ने उनका पीछा किया. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उन्होंने दया की गुहार भी लगाई, लेकिन हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी.

जीवनसाथी भी गहरे सदमे और खौफ में डूबे

यह सब उनके साथ मौजूद लोगों की आंखों के सामने हुआ. उनकी पत्नी नागमणि और बाकी साथी झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छिपकर किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहे. उस वक्त उन्हें उम्मीद थी कि चंद्रमौली कहीं घायल अवस्था में मिल जाएंगे, लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आ गई. जैसे-जैसे मृतकों के बारे में जानकारी सामने आने लगी, नागमणि के साथ-साथ शशिधर, अप्पन्ना और उनके जीवनसाथी भी गहरे सदमे और खौफ में डूब गए. फिर एक ऐसी खबर आई जिसने उनके दिलों को पूरी तरह से तोड़कर रख दिया.

परिवारों के दिलों का दर्द आज तक नहीं हुआ कम

23 अप्रैल को चंद्रमौली का पार्थिव शरीर विशाखापत्तनम पहुंचा. पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई. उनके दोस्त, जो इस हमले के गवाह थे, आज भी उस दिन को याद करके कांप उठते हैं. हमले के बाद भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए ऑपरेशन सिंदूर चलाया और जिम्मेदार आतंकियों को जवाब दिया. लेकिन सरकारी कार्रवाई से भी उन परिवारों के दिलों का दर्द कम नहीं हुआ, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया. आज, एक साल बाद भी, बचे हुए लोग मानसिक आघात से जूझ रहे हैं.

कब तक निर्दोष लोग आतंक का बनेंगे शिकार

कई लोग पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस का सामना कर रहे हैं. अचानक तेज आवाज सुनते ही घबरा जाना, उस दिन के दृश्य बार-बार याद आना और भीड़भाड़ वाली जगहों से डर लगना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. बैसरन घाटी, जो कभी सुकून और सुंदरता का प्रतीक थी, अब कई लोगों के लिए डर और दर्द की याद बन चुकी है. यह हमला सिर्फ आंकड़ों में दर्ज एक घटना नहीं, बल्कि उन परिवारों की अधूरी कहानियों का हिस्सा है, जिनके अपने कभी लौटकर नहीं आए. यह त्रासदी एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर कब तक निर्दोष लोग आतंक का शिकार बनते रहेंगे. और कब उन वादियों में सिर्फ सुकून की गूंज सुनाई देगी, गोलियों की नहीं.