Sabarimala Case: आस्था या संविधान? सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच के सामने तीखी बहस, ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ पर उठे बड़े सवाल
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई के दौरान, आस्था, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस हुई. दरअसल, केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 5वें दिन की सुनवाई जारी रही. इस दौरान विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकीलों ने अपने-अपने तर्क पेश किए, और इस मुद्दे के सामाजिक और कानूनी पहलुओं को सामने रखा.
इससे पहले 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल की सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है. साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता. पांचवे दिन आत्मार्थम ट्रस्ट की ओर से पेश होते हुए, वकील एम.आर. वेंकटेश ने ‘संप्रदाय’ शब्द की व्याख्या को चुनौती दी. उन्होंने तर्क दिया कि यह शब्द विदेशी मूल का है और भारतीय संदर्भ में इसकी अपनी सीमाएं हैं. उन्होंने दलील दी कि गैर-सांप्रदायिक मंदिरों के अधिकारों को भी समान सुरक्षा दी जानी चाहिए. वेंकटेश ने आगे कहा कि कई महिलाएं स्वेच्छा से मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में प्रवेश करने से बचती हैं. इस प्रथा को परंपरा और व्यक्तिगत आस्था के दायरे में समझा जाना चाहिए.
सभी धर्मों के अधिकारों को ध्यान में रखे सुप्रीम कोर्ट
इसके विपरीत, वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कोर्ट के सामने एक व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि कोर्ट को एक संतुलित फैसला देना चाहिए जो सभी धर्मों के अधिकारों को ध्यान में रखे. धवन ने यह भी कहा कि आस्था समय के साथ विकसित होती है, और ऐसा विकास केवल कानूनी उपायों से नहीं लाया जा सकता. उनके अनुसार, असहमति और विभाजन से भरे समाज में, कोर्ट को एक सामंजस्यपूर्ण व्याख्या अपनानी चाहिए.
संविधान में निहित कुछ अधिकार धार्मिक प्रथाओं से ऊपर
धवन ने आगे स्पष्ट किया कि किसी भी धर्म पर सम्मानपूर्वक सवाल उठाना एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है; हालांकि, हेट स्पीच को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि संविधान में निहित कुछ अधिकार धार्मिक प्रथाओं से ऊपर हैं, और इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए. राजीव धवन ने वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंहवी के इस तर्क से असहमति जताई कि सबरीमाला के अलावा भगवान अयप्पा के अन्य मंदिर भी हैं जहां मासिक धर्म वाली महिलाएं जा सकती हैं.उन्होंने इस तर्क से असहमति जताई.
न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि आस्था से जुड़े मामलों पर फैसला सुनाते समय, एक संवैधानिक संस्था को व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों से ऊपर उठकर एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ के दायरे पर सवाल उठाते हुए, उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को फैसला सुनाते समय अपनी व्यक्तिगत धार्मिक चेतना से ऊपर उठना चाहिए और व्यापक संवैधानिक ढांचे द्वारा निर्देशित होना चाहिए.
संविधान की व्याख्या केवल धर्म तक ही सीमित नहीं
पीठ ने यह भी संकेत दिया कि संविधान की व्याख्या केवल धर्म तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे अंतरात्मा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के व्यापक दायरे में भी किया जाना चाहिए. अदालत की इन टिप्पणियों ने इस बहस को और भी अधिक गहराई प्रदान की है कि क्या धार्मिक परंपराएँ संवैधानिक मूल्यों पर वरीयता पा सकती हैं. अब मामले की अगली सुनवाई के दौरान, इस जटिल प्रश्न पर संभवतः और भी विस्तार से चर्चा की जाएगी. एक ऐसी प्रक्रिया जो देश में धर्म और अधिकारों के बीच संतुलन के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त कर सकती है.
HC ने 1991 में लगाई थी रोक, SC ने 2018 में हटाया
वहीं मंदिर प्रशासन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने कहा कि सबरीमाला कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है. यहां के देवता ब्रह्मचारी हैं. भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं. अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं. उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है. केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया. फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है. मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है.