साइलो योजना में अब दो कंपनियों का एकाधिकार
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: भारतीय खाद्य निगम की 20,000 करोड़ रुपये की साइलो कार्यक्रम योजना, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए भारत के खाद्यान्न भंडारण का आधुनिकीकरण करना था, अब एक बड़े विवाद के केंद्र में है। एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से अनाज भंडारण की यह महात्वाकांक्षी योजना अंततः देश की सिर्फ दो बड़ी कंपनियों के हाथों में सिमट कर रह गई है। याद दिला दें कि हाल ही में केंद्र सरकार ने इसी पीडीएस व्यवस्था के लिए अलग से बड़ी धनराशि आवंटित करने का एलान किया था। जिससे उस फैसले का असली मकसद अब सामने आ गया है।
एफसीआई की इस हब एंड स्पोक साइलो योजना के शुरुआती दो चरणों के दौरान कुल 134 साइलो ठेके जारी किए गए थे। इनमें से रिकॉर्ड 110 ठेके, जिनकी कुल कीमत 16,500 करोड़ रुपये से अधिक है, अकेले अडानी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपने नाम कर लिए हैं। इस योजना के तहत देश भर में कुल 60 लाख मीट्रिक टन अनाज के भंडारण की क्षमता विकसित की जानी थी, जिसमें से लगभग 46.5 लाख मीट्रिक टन अनाज का भंडारण केवल इन दो कंपनियों के स्वामित्व वाले साइलो में किया जाएगा।
इस पूरे टेंडर आवंटन में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एफसीआई ने स्वयं शुरुआत में निविदा दस्तावेजों में एक एकाधिकार-विरोधी खंड जोड़ने का प्रस्ताव रखा था। इस क्लॉज का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई एक या दो बड़ी कंपनियां पूरे प्रोजेक्ट पर कब्जा न कर सकें और छोटे व क्षेत्रीय डेवलपर्स को भी इसमें मौका मिले।
हालांकि, साल 2022 में हुई एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नीति-निर्धारक बैठक के दौरान केंद्र सरकार के नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग ने एफसीआई के इस एकाधिकार-विरोधी प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया। दोनों शीर्ष संस्थाओं का तर्क था कि इस क्षेत्र में बाजार की शक्तियों को स्वतंत्र रूप से काम करने देना चाहिए और किसी भी प्रकार का कृत्रिम प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। इस विरोध के बाद एफसीआई को वह सुरक्षात्मक खंड हटाना पड़ा।
इस नियम के हटते ही निविदाओं के आवंटन का पूरा परिदृश्य बदल गया। फेज़-1 के दूसरे दौर की निविदाओं में अडानी समूह ने हर एक सिंगल कॉन्ट्रैक्ट को अपने नाम कर लिया। वहीं, फेज़-2 के आते-आते भारतीय अनाज भंडारण बाजार में एक स्पष्ट दुओपॉली या दो कंपनियों का एकाधिकार) उभर कर सामने आ गई। परिणामतः, भारत के अब तक के सबसे बड़े और आधुनिक खाद्यान्न भंडारण कार्यक्रम पर अडानी और लीप इंडिया का पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो चुका है, जिसने अब इस पूरी पारदर्शी प्रक्रिया और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पर गंभीर नीतिगत सवाल खड़े कर दिए हैं।