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म्यांमार में एकतरफा चुनाव का असली मकसद सामने आया

जुंटा प्रमुख मिन आंग हलिंग चुने गए राष्ट्रपति

एजेंसियां

यांगून: म्यांमार में पांच साल पहले तख्तापलट कर सत्ता हथियाने वाले सैन्य जनरल मिन आंग हलिंग अब देश के औपचारिक राष्ट्रपति बन गए हैं। शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026 को राजधानी नेपीडॉ में आयोजित संसदीय सत्र के दौरान प्रो-मिलिट्री (सेना समर्थक) सांसदों ने भारी बहुमत से उनके नाम पर मुहर लगा दी। इस कदम को विश्लेषक सैन्य शासन को एक नागरिक सरकार का मुखौटा पहनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता हासिल की जा सके।

संसद के अध्यक्ष आंग लिन ड्वे ने घोषणा की कि मिन आंग हलिंग को राष्ट्रपति के रूप में चुना गया है। संसद के दोनों सदनों में हुए मतदान में हलिंग को कुल 584 मतों में से 429 वोट मिले। यह चुनाव उन सांसदों के बीच हुआ, जो हाल ही में जुंटा द्वारा आयोजित विवादित चुनावों के जरिए चुनकर आए हैं। गौरतलब है कि सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी ने जनवरी में संपन्न हुए चुनावों में 80 प्रतिशत से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके अलावा, म्यांमार के संविधान के तहत 25 प्रतिशत सीटें पहले से ही गैर-निर्वाचित सैन्य अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं।

69 वर्षीय जनरल मिन आंग हलिंग ने फरवरी 2021 में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई आंग सान सू की की सरकार का तख्तापलट किया था। तब से सू की जेल में हैं और उनकी पार्टी को भंग कर दिया गया है। पिछले पांच वर्षों में म्यांमार भीषण गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है, जिसमें अब तक हजारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए हलिंग को संवैधानिक रूप से अपने सैन्य पद को छोड़ना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने सेना की कमान अपने वफादार और पूर्व खुफिया प्रमुख ये विन ओ को सौंप दी है।

चीन जैसे जुंटा के प्रमुख सहयोगियों ने इस चुनाव का स्वागत किया है और बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने का वादा किया है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और पश्चिमी देशों ने इस पूरी प्रक्रिया को ढोंग करार दिया है। बर्मा कैंपेन यूके का कहना है कि यह केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने की एक चाल है। म्यांमार की जनता में भी भारी असंतोष है; यांगून के निवासियों का मानना है कि इस फर्जी चुनाव से देश की स्थिति और बिगड़ेगी। विपक्षी गुट और विद्रोही सेनाएं अभी भी सैन्य तानाशाही के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं, जिससे शांति की उम्मीद फिलहाल कम ही नजर आती है।