मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वाच की ताजा रिपोर्ट
न्यूयॉर्क: मानवाधिकार निगरानी संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में बुर्किना फासो की सेना और उसके सहयोगी मिलिशिया पर रोंगटे खड़े कर देने वाले आरोप लगाए हैं। गुरुवार को जारी नन कैन रन अवे शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम अफ्रीकी देश में सेना द्वारा फुलानी नागरिकों का जातीय सफाया किया जा रहा है, जो युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आता है।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह रिपोर्ट जनवरी 2023 से अगस्त 2025 के बीच हुए अत्याचारों पर आधारित की है। इसके लिए बुर्किना फासो, बेनिन, आइवरी कोस्ट, घाना और माली में 450 से अधिक लोगों के साक्षात्कार लिए गए। शोधकर्ताओं ने उपग्रह चित्रों, वीडियो फुटेज और आधिकारिक दस्तावेजों का विश्लेषण कर 57 ऐसी घटनाओं की पुष्टि की है, जिनमें बुर्किनाबे सैन्य बलों, उनके सहयोगी मिलिशिया वॉलंटियर्स फॉर द डिफेंस ऑफ द होमलैंड और अल-कायदा से जुड़े सशस्त्र समूह जेएनआईएम की संलिप्तता पाई गई।
रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2023 से अगस्त 2025 के बीच देश में कुल 1,837 नागरिक मारे गए, जिनमें से 1,200 से अधिक मौतों के लिए सीधे तौर पर सरकारी बल जिम्मेदार थे। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, इस संघर्ष के शुरू होने के बाद से अब तक कम से कम 20 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। सबसे भीषण घटनाओं में से एक दिसंबर 2023 में उत्तरी शहर जिबो के पास हुई, जहाँ सेना और मिलिशिया ने लगभग 16 गाँवों में 400 से अधिक नागरिकों की हत्या कर दी थी।
संगठन ने पाया कि सितंबर 2022 में सत्ता संभालने वाली सैन्य सरकार और उसके सहयोगी मुख्य रूप से फुलानी जातीय समूह को निशाना बना रहे हैं। उन पर सशस्त्र समूहों का समर्थन करने का आरोप लगाकर पूरे समुदायों को खत्म किया जा रहा है। रिपोर्ट में राष्ट्रपति इब्राहिम त्रोरे और छह वरिष्ठ सैन्य कमांडरों के साथ-साथ जेएनआईएम के नेता इयाद अग घाली की भूमिका की जांच करने की मांग की गई है। पीड़ितों के परिजनों ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए लोगों को डराया-धमकाया जाता है और महिलाओं व बच्चों तक की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है।
ह्यूमन राइट्स वॉच के कार्यकारी निदेशक फिलिप बोलोपियन ने इस संकट पर वैश्विक ध्यान की कमी पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सैन्य जुंटा न केवल खुद भयानक अत्याचार कर रहा है, बल्कि वह किसी भी पक्ष को जवाबदेह ठहराने में विफल रहा है। नागरिक पीड़ा को छिपाने के लिए रिपोर्टिंग पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। यह रिपोर्ट बुर्किना फासो में गहराते मानवीय संकट की ओर दुनिया का ध्यान खींचने का एक गंभीर प्रयास है।