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अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता तय कौन करेगा

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचारों की आजादी, ये शब्द सुनने में जितने गौरवशाली और लुभावने लगते हैं, क्या वास्तव में इनका अर्थ उतना ही गहरा है? या फिर ये शब्द केवल लोकतांत्रिक शब्दकोश की शोभा बढ़ाने वाले आभूषण मात्र बनकर रह गए हैं? समय-समय पर घटित होने वाली घटनाएं इन जटिल प्रश्नों को हमारे सामने खड़ा करती हैं।

कभी ये सवाल समाज में वैचारिक लहरें पैदा करते हैं, तो कभी व्यवस्था के दबाव में दबकर रह जाते हैं। एक बनावटी सुख और छद्म सहजता हमें अवचेतन रूप से यह समझा देती है कि सब ठीक है और हम इसी यथास्थिति में खुश रहना सीख जाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम कितने ठीक हैं या कितने बुरे हाल में, इसके अपने कुछ मापदंड होते हैं।

व्यक्ति दर व्यक्ति इन मापदंडों की परिभाषा बदल सकती है। बुनियादी सवाल यह है कि मुझे क्या कहना चाहिए, कितना कहना चाहिए और कितना बोलना मेरे संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आता है? भारत का संविधान स्पष्ट रूप से भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर है, लेकिन हालिया कुछ घटनाएं हमें कान पकड़कर यह समझा देती हैं कि हे नागरिक, तुम्हारी सीमा बस यहीं तक है।

सत्ता के शीर्ष पर बैठे भाग्यविधाताओं को जो बातें पसंद न आएं, उन्हें कहना शायद आपके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा नहीं है। परिणाम स्वरूप, हाथ में पेंसिल होने के बावजूद कोरे कागज पर शब्द नहीं उतर पाते। कुणाल कामरा द्वारा शो में किए गए व्यंग्य को ही सच साबित करता है। यह हमला दर्शाता है कि जब तर्क खत्म हो जाते हैं, तो असहिष्णुता हिंसा का रूप ले लेती है।

हम विज्ञान के उस सूत्र के अभ्यस्त हैं जहाँ हर क्रिया की एक समान प्रतिक्रिया होती है। लेकिन आज के दौर में क्रिया के अनुपात में प्रतिक्रिया की तीव्रता कहीं अधिक है। किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया दी जा सकती है और उसे मुद्दा बनाया जा सकता है। इसके लिए उदाहरण देकर लेख का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है; जो लोग देश की दैनिक खबरों पर नजर रखते हैं, वे भली-भांति जानते हैं कि कैसे, कहाँ से और किस तरह की प्रतिक्रियाओं को खोदकर निकालने की कोशिश दिन-रात जारी रहती है।

किसी की आस्था, किसी की विचारधारा या किसी की कुर्सी को ठेस पहुँचाने के नाम पर अभिव्यक्ति का गला घोंटना एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि कॉमेडी का अर्थ केवल अपशब्द या फूहड़ता नहीं है। यह कोई सतही या हल्का विषय भी नहीं है। इसके विपरीत, यह एक अत्यंत गहरा विषय है।

कॉमेडी हमारे आसपास की विसंगतियों, कमियों और बुराइयों को एक अलग आवरण में समाज के सामने पेश करने का प्रयास है। इसके लिए मेधा, धैर्य, निरंतर अभ्यास और समाज की गहरी समझ की आवश्यकता होती है। यह हर किसी के बस की बात नहीं है। यदि वह हास्य सत्ता को समझ न आए या उस हास्य से लक्ष्य की आत्मा पर आंच आए, तो समझ लेना चाहिए कि कॉमेडियन का प्रयास सफल रहा।

व्यंग्य की ओट में उसने वास्तव में उस नग्न सत्य को उजागर कर दिया है जिसे समाज और सत्ता छिपाना चाहते थे। लोकतंत्र में आम आदमी का अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार किसी की दान में दी गई खैरात नहीं है। यह संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है। ऐसे में, यदि कोई अपनी शक्ति या संख्याबल के दम पर इस अधिकार के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींचने की कोशिश करता है, तो यह उस लोकतांत्रिक प्रवृत्ति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

इस प्रवृत्ति पर न केवल बहस होनी चाहिए, बल्कि इसका पुरजोर विरोध भी होना चाहिए। यह अधिकार संघर्षों के माध्यम से अर्जित किया गया है, न कि किसी की दया पर निर्भर है। इसलिए, इस अधिकार की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करना ही एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है। इस लड़ाई में अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखना और सच के साथ खड़ा होना अनिवार्य है।

संविधान में उल्लेखित तथ्यों को अगर छोड़ भी दें तो नैतिक तौर पर यह सवाल हमारे अपने अंदर पनपता रहता है कि क्या हम सच के साथ खड़े हैं अथवा सब कुछ जानकर भी गलत का साथ दे रहे हैं। समाज को यह तय करना होगा कि वह एक ऐसा मौन चाहता है जहाँ कोई सवाल न हो, या फिर वह एक ऐसा शोर चाहता है जहाँ हर विचार को जगह मिले। यदि हम असहमत होने के अधिकार को खो देते हैं, तो हम एक लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान खो देंगे। यह समय है कि हम उन सीमाओं को पहचानें जो सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि नियंत्रण के लिए बनाई जा रही हैं।