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नीतीश कुमार ने विधान परिषद से दिया इस्तीफा

बिहार की राजनीति अब अगले चरण की तरफ अग्रसर

  • नये सीएम को लेकर अटकलबाजी

  • जदयू खुला मैदान नहीं छोड़ेगी

  • भाजपा के भीतर कई दावेदार

राष्ट्रीय खबर

पटनाः बिहार की राजनीति के एक युग का समापन और एक नए अध्याय की शुरुआत सोमवार, 30 मार्च 2026 को हुई, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद की सदस्यता से अपना औपचारिक इस्तीफा सौंप दिया। यह कदम उनके इसी महीने राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद उठाया गया है, जिससे उनके दिल्ली की राजनीति में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

नीतीश कुमार 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने गए थे और उसी दिन उन्हें निर्वाचन का प्रमाण पत्र भी सौंप दिया गया था। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति संसद के लिए चुना जाता है, तो उसे 14 दिनों के भीतर अपनी मौजूदा विधायी सदस्यता (चाहे वह विधानसभा हो या विधान परिषद) से इस्तीफा देना अनिवार्य होता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो उसकी नई सदस्यता (संसद) स्वतः रद्द मानी जाती है। इसी नियम का पालन करते हुए, नीतीश कुमार ने 30 मार्च को अपना इस्तीफा दिया। उनकी ओर से एमएलसी संजय गांधी ने आधिकारिक तौर पर इस्तीफा पत्र सौंपा।

नीतीश कुमार का बिहार विधान परिषद के साथ लगभग दो दशकों का लंबा सफर अब समाप्त हो गया है। वे पहली बार 2006 में सदन के सदस्य बने थे और उसके बाद उन्होंने लगातार चार कार्यकाल—2006-2012, 2012-2018, 2018-2024 और 2024 से अब तक—पूरे किए। गौरतलब है कि नवंबर 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से नीतीश कुमार ने अधिकांश समय विधानसभा चुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद की सदस्यता के जरिए ही सत्ता संभाली थी। हालांकि, अपने शुरुआती करियर में वे 1985 में हरनौत से विधायक चुने गए थे और लोकसभा के सदस्य के रूप में भी देश की सेवा कर चुके हैं।

राज्यसभा में प्रवेश के साथ ही नीतीश कुमार के नाम एक दुर्लभ उपलब्धि दर्ज होने जा रही है। वे उन चुनिंदा राजनेताओं में शामिल होंगे जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र के चारों विधायी निकायों—बिहार विधानसभा, लोकसभा, बिहार विधान परिषद और अब राज्यसभा—की सदस्यता हासिल की है।

विधान परिषद से इस्तीफे के बाद, संवैधानिक नियमों के अनुसार उन्हें मुख्यमंत्री पद से भी तकनीकी रूप से इस्तीफा देना होगा। हालांकि, कानून उन्हें सदन का सदस्य न रहते हुए भी छह महीने तक पद पर बने रहने की अनुमति देता है। इस अवधि के भीतर उन्हें या तो फिर से राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य बनना होगा या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प पर विचार करना होगा। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना न केवल उनके करियर का बड़ा बदलाव है, बल्कि आने वाले समय में बिहार के राजनीतिक समीकरणों को भी गहराई से प्रभावित करेगा।