प्रेस की स्वतंत्रता पर आर्थिक दबाव भी अत्यधिक काम करता है
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की हालिया टिप्पणी भारतीय मीडिया जगत में एक महत्वपूर्ण विमर्श का विषय बन गई है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा केवल प्रत्यक्ष सेंसरशिप से नहीं, बल्कि आर्थिक और विनियामक दबावों से भी उत्पन्न होता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने दिल्ली में आईपीआई इंडिया अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म 2025 के दौरान अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता भले ही कानूनी रूप से सुरक्षित हो, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसे कमजोर किया जा सकता है।
न्यायाधीश के अनुसार, खतरा अब अनुच्छेद 19(2) के तहत प्रत्यक्ष सेंसरशिप से उतना नहीं है, जितना कि अनुच्छेद 19(6) के तहत उचित ठहराए गए आर्थिक विनियमन से है। स्वामित्व नियम, लाइसेंसिंग कानून, कराधान और विज्ञापन नीतियां ऐसे उपकरण बन गए हैं, जिनका उपयोग सरकारें अप्रत्यक्ष रूप से संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित करने के लिए कर सकती हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने रेखांकित किया कि मीडिया आउटलेट कागजों पर स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन उनका मालिकाना हक रखने वाले समूहों के आर्थिक हित उन्हें आलोचनात्मक पत्रकारिता से रोक सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई मीडिया घराना सरकार की आलोचना करता है, तो उसे विज्ञापनों में कटौती का सामना करना पड़ सकता है।
सरकारी विज्ञापनों और पीएसयू के विज्ञापनों पर निर्भरता संपादकों को आत्म-सेंसरशिप के लिए मजबूर कर देती है। न्यायाधीश ने समझाया कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता संविधान के दो प्रमुख अनुच्छेदों के बीच के सामंजस्य से निकलती है। अनुच्छेद 19(1)(ए): जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। अनुच्छेद 19(1)(जी): जो व्यवसाय या पेशे की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रेस की स्वतंत्रता न केवल एक संवैधानिक अधिकार है, बल्कि एक नैतिक अभ्यास भी है, जो निष्पक्षता और पारदर्शिता पर टिका है। उनका मानना है कि कानून शायद प्रेस को सीधे चुप न कराए, लेकिन यह ऐसी स्थितियाँ पैदा कर सकता है जहाँ पत्रकारिता का स्वरूप ही बदल जाए। कुछ खबरें सुरक्षित हो जाती हैं और कुछ जोखिम भरी, जिससे अंततः जनता तक पहुंचने वाली सूचनाओं का संतुलन बिगड़ जाता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की यह टिप्पणी पत्रकारिता के पेशे में आर्थिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को उजागर करती है। उनका संदेश स्पष्ट है: यदि मीडिया अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है, तो उसे केवल कानूनी सुरक्षा पर निर्भर न रहकर अपनी संपादकीय नैतिकता और आर्थिक स्वायत्तता को भी मजबूत करना होगा।