पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची का एक और कारनामा
राष्ट्रीय खबर
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया ने उस समय एक नया मोड़ ले लिया, जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शाहिदउल्लाह मुंशी का नाम ही आधिकारिक मतदाता सूची से हटा दिया गया। गुरुवार को इस घटनाक्रम पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व न्यायाधीश ने इसे न केवल एक तकनीकी त्रुटि, बल्कि बेहद अपमानजनक अनुभव बताया।
न्यायमूर्ति मुंशी, जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर आसीन हैं, ने स्पष्ट किया कि न्यायनिर्णयन प्रक्रिया के बाद उनका नाम हटाया जाना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने घोषणा की है कि वह इस प्रशासनिक निर्णय के विरुद्ध एक अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष औपचारिक अपील दायर करेंगे। उनका तर्क है कि यदि एक पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान बोर्ड अध्यक्ष का नाम इस तरह से हटाया जा सकता है, तो सामान्य नागरिकों की स्थिति और भी विकट हो सकती है।
भारत निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद 23 मार्च को पहली पूरक मतदाता सूची जारी की थी। उल्लेखनीय है कि यह पूरी कवायद उच्चतम न्यायालय के उन निर्देशों के अधीन संचालित की जा रही है, जिसमें मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक अधिकारियों को न्यायनिर्णयन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 23 मार्च की सूची में उन लोगों के नाम शामिल थे जिनके दावों और आपत्तियों का निपटारा इन न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया गया था।
पूर्व न्यायाधीश मुंशी ने इस विसंगति को सुधारने के लिए कानूनी मार्ग अपनाने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि उनके जैसे रसूखदार व्यक्ति का नाम हटने से निर्वाचन आयोग की इस संशोधन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। यह मामला अब केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल में चुनावी डेटा के प्रबंधन और नागरिक अधिकारों के बीच के टकराव का एक प्रमुख उदाहरण बन गया है।