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दस करोड़ घूस लिया था बैंक के अफसर ने

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी मामले में और खुलासा

राष्ट्रीय खबर

चंडीगढ़: हरियाणा में बैंकिंग और सरकारी तंत्र को हिलाकर रख देने वाले 590 करोड़ रुपये के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक घोटाले में हर दिन नए और चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। हरियाणा राज्य सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच अब उन कड़ियों को जोड़ रही है, जिसमें निजी बैंकों के बड़े अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे किए।

पंचकूला की एक विशेष अदालत में सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी ने बेहद महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। ब्यूरो ने अदालत को बताया कि एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के पूर्व क्षेत्रीय प्रमुख, अरुण शर्मा ने इस घोटाले को अंजाम देने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। जांच के अनुसार, शर्मा ने मामले के मुख्य आरोपियों के साथ मिलीभगत कर अवैध बैंकिंग गतिविधियों को सुगम बनाया और इसके बदले में कथित तौर पर 10 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि प्राप्त की। यह राशि उन्हें घोटाले की साजिश को सफल बनाने और धन के अवैध हस्तांतरण में मदद करने के लिए रिश्वत या कमीशन के रूप में दी गई थी।

इस बहु-करोड़ रुपये के घोटाले की गहराई से जांच करने के लिए गठित विशेष जांच दल की सदस्य और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी मेधा भूषण ने 19 मार्च को अदालत को विस्तृत ब्रीफिंग दी। उन्होंने बताया कि अरुण शर्मा ने आईडीएफसी के पूर्व कर्मचारियों—रिभव ऋषि और अभय कुमार—के साथ मिलकर एक नेटवर्क तैयार किया था। रिभव और अभय इस पूरे प्रकरण के मास्टरमाइंड माने जा रहे हैं, जिन्होंने बैंक के आंतरिक सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर सरकारी धन का गबन किया।

एसआईटी के अनुसार, इस सिंडिकेट ने सरकारी धन को निजी खातों में डाइवर्ट करने के लिए फर्जी दस्तावेजों और शेल कंपनियों का सहारा लिया। अब तक इस मामले में 15 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

अदालत ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका को देखते हुए सभी 15 आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। ब्यूरो अब उन संपत्तियों की पहचान कर रहा है जो इस घोटाले के पैसे से खरीदी गई थीं। साथ ही, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या यह नेटवर्क अन्य राज्यों में भी फैला हुआ है।

यह घोटाला न केवल बैंकिंग सुरक्षा प्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रबंधन में सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत के गंभीर संकट को भी दर्शाता है। एसआईटी का मानना है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़ी गिरफ्तारियाँ संभव हैं, क्योंकि जांच अब उन ‘सफेदपोश’ चेहरों तक पहुँच रही है जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इस पूरी साजिश की पटकथा लिखी थी।