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न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने बेंगलुरु में कड़ा बयान दे दिया

यूएपीए का दुरुपयोग विकसित भारत की सोच के खिलाफ

राष्ट्रीय खबर

बेंगलुरुः न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक विकसित राष्ट्र का निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए देश के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने में गहरे सुधार की आवश्यकता है।

न्यायमूर्ति भुयान ने इस बात पर विशेष बल दिया कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश में वैचारिक विमर्श, बहस और असहमति के लिए अधिक स्थान होना अनिवार्य है। उन्होंने आगाह किया कि लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर होने वाली असहमति या विरोध को आपराधिक श्रेणी में नहीं डाला जाना चाहिए। उनके अनुसार, एक जीवंत लोकतंत्र वही है जहाँ नागरिक बिना किसी भय के अपनी बात रख सकें और सरकार की नीतियों पर स्वस्थ बहस कर सकें।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त गहरी सामाजिक दरारों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि जाति आधारित भेदभाव और दलितों पर होने वाले अत्याचार वे बाधाएं हैं जिन्हें मिटाए बिना विकसित भारत का सपना अधूरा है। जब तक समाज का एक वर्ग हाशिए पर रहेगा और जातिगत असमानता बनी रहेगी, तब तक समावेशी विकास संभव नहीं है।

कानूनी परिप्रेक्ष्य में, न्यायमूर्ति भुयान ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) जैसे आतंकवाद-रोधी कानूनों के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बिना सोचे-समझे की गई गिरफ्तारियां और इन मामलों में दोषसिद्धि की बेहद कम दर किसी भी सूरत में विकसित भारत का मॉडल नहीं हो सकती। यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों और न्याय प्रणाली की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठाता है।

अंत में, उन्होंने संविधान के राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके लिए विकसित भारत का अर्थ धन का समान वितरण और समाज में व्याप्त तीव्र असमानता का उन्मूलन है। एक ऐसा राष्ट्र जहाँ संसाधनों पर सबका अधिकार हो और अमीरी-गरीबी की खाई न्यूनतम हो, वही वास्तविक अर्थों में विकसित कहलाने का हकदार है।