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गंगा की आस्था वनाम प्रदूषण का सवाल

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः वाराणसी से कुछ ही महीनों के अंतराल में सामने आए दो वायरल वीडियो ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन दोनों घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गंगा के तट पर कानून, धार्मिक भावना और पर्यावरणीय जवाबदेही के मामले में प्रशासन का रवैया कितना भिन्न हो सकता है।

ताजा मामला इसी सप्ताह का है, जहाँ 14 मुस्लिम युवकों को एक नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कथित तौर पर उन्हें मांसाहारी भोजन करते और हड्डियों सहित जूठन को सीधे गंगा में फेंकते हुए दिखाया गया था। पुलिस ने इस मामले में बिजली की गति से कार्रवाई की।

धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने, पूजा स्थल को अपवित्र करने और प्रदूषण फैलाने से संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। अधिकारियों ने इस कृत्य को केवल गंदगी फैलाने के रूप में नहीं, बल्कि हिंदू धर्म में पूजनीय गंगा की पवित्रता पर प्रहार के रूप में पेश किया। प्रशासन का संदेश स्पष्ट था कि गंगा केवल एक जल निकाय नहीं बल्कि आस्था का केंद्र है, और इसकी मर्यादा का उल्लंघन आपराधिक कार्रवाई को आमंत्रित करेगा।

दूसरी ओर, इस साल जनवरी का एक वीडियो एक अलग ही कहानी बयां करता है। उस वीडियो में वाराणसी में चलने वाले एक लक्जरी क्रूज से सीधे गंगा नदी में सीवेज (मल-मूत्र) गिरता हुआ दिखाई दे रहा था। इन दृश्यों ने भारी आक्रोश पैदा किया और जिला प्रशासन तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा आधिकारिक जांच शुरू की गई।

जांच का निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाला रहा, जिसे प्रशासन ने महज एक तकनीकी चूक करार दिया। अधिकारियों के अनुसार, यह रिसाव जहाज के सेप्टिक सिस्टम के रखरखाव के दौरान हुआ था, जब एक आपातकालीन वाल्व खुला रह गया था। इस मामले में कार्रवाई का पैमाना बिल्कुल अलग था—क्रूज ऑपरेटर पर केवल 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया और नोटिस जारी किए गए। न तो कोई प्राथमिकी दर्ज हुई और न ही कोई गिरफ्तारी की गई। एक तरफ आस्था के नाम पर तुरंत जेल और दूसरी तरफ वास्तविक प्रदूषण पर मामूली जुर्माना—यह विरोधाभास आज चर्चा का केंद्र बना हुआ है।