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स्थानीय निकाय चुनाव में बुरी तरह फेल हुआ आयोग

राज्य चुनाव आयोग ने जागरुकता नहीं फैलायी

  • बैलेट पेपर पर प्रशिक्षण का अभाव

  • रद्द मतों के आंकड़े से बढ़ी चिंता

  • तकनीकी गलतियाँ और भ्रम की स्थिति

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम तो सामने आ गए हैं, लेकिन इन नतीजों ने राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनावी डेटा और जमीनी हकीकत का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि आयोग मतदाताओं को जागरूक करने के अपने बुनियादी कर्तव्य में पूरी तरह विफल रहा है। इस विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है—रिकॉर्ड संख्या में मतों का अमान्य (रिजेक्ट) होना।

विशेषज्ञों का मानना है कि 2013 के बाद पहली बार निकाय चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बजाय बैलेट पेपर का उपयोग किया गया। एक पूरी पीढ़ी जिसे ईवीएम से वोट डालने की आदत हो चुकी थी, उसे अचानक पुराने ढर्रे पर ले जाया गया, लेकिन इसके लिए आवश्यक वोटर एजुकेशन नदारद रही। आमतौर पर चुनाव से पूर्व बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन इस बार आयोग की सुस्ती ने हजारों मतदाताओं के मताधिकार को व्यर्थ कर दिया।

विभिन्न नगर निकायों से प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, अमान्य मतों की संख्या चौंकाने वाली है। यद्यपि आयोग ने अभी तक राज्य स्तर पर समेकित डेटा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन जिला स्तर के आंकड़े स्थिति की गंभीरता दर्शाते हैं:

धनबाद नगर निगम: यहाँ 10वें राउंड की गिनती तक ही 31,727 वोट अमान्य घोषित कर दिए गए। यह किसी भी चुनावी प्रक्रिया के लिए एक बड़ा और चिंताजनक आंकड़ा है। इसी गहमागहमी के बीच भाजपा के बागी प्रत्याशी संजीव सिंह 1,14,362 वोट पाकर मेयर चुने गए। गुमला नगर परिषद: यहाँ कुल 3,654 वोट रद्द हुए, जिनमें अध्यक्ष पद के लिए 1,925 और पार्षद पद के लिए 1,729 मत शामिल थे। देवघर और चास: देवघर नगर निगम में 6,114 और चास नगर निगम में 5,258 मत तकनीकी त्रुटियों के कारण रिजेक्ट कर दिए गए। चास में कुल विधिमान्य मतों की संख्या 77,053 रही। मेदिनीनगर: यहाँ भी 4,398 मतदाताओं की मेहनत पर पानी फिर गया और उनके वोट अवैध करार दिए गए।

मतदान के दौरान वोट रद्द होने के पीछे मुख्य रूप से मतदाताओं में जानकारी का अभाव पाया गया। गुलाबी मतपत्र (मेयर/अध्यक्ष) और सफेद मतपत्र (पार्षद) को एक ही मतपेटिका में डालने से न केवल भ्रम बढ़ा, बल्कि गिनती की प्रक्रिया भी पेचीदा हो गई। मतदाताओं ने सही जगह मुहर न लगाना, एक से अधिक उम्मीदवारों पर निशान लगाना या दोनों पदों के लिए गलत तरीके से मतदान करने जैसी गलतियाँ कीं। इसके अलावा, नोटा का विकल्प न होने के कारण भी कई मत अवैध श्रेणी में चले गए।

राज्य भर में मतदान का कुल प्रतिशत 63.05 रहा, जो करीब 43 लाख पंजीकृत मतदाताओं की सक्रियता को दर्शाता है। लेकिन, इतनी बड़ी भागीदारी के बावजूद हजारों मतों का बेकार जाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। अब आयोग अपनी कमियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है, परंतु धनबाद और गुमला जैसे निकायों के नतीजे साफ कर रहे हैं कि यदि समय रहते व्यापक जागरूकता अभियान चलाया गया होता, तो जनादेश की तस्वीर और अधिक स्पष्ट होती।