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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का एक और बड़ा बयान

जाति अब केवल राजनीतिक स्वार्थ का साधन

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने जाति व्यवस्था को लेकर एक बार फिर देश के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में नई बहस छेड़ दी है। संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित एक संवादात्मक सत्र के दौरान, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि समकालीन भारत में जाति का अस्तित्व अब मुख्य रूप से स्वार्थी हितों और राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही बचा है।

भागवत ने तर्क दिया कि ऐतिहासिक रूप से जाति व्यवस्था का एक आधार पारंपरिक व्यवसाय हुआ करता था, लेकिन आधुनिकता और आर्थिक बदलावों के कारण वह आधार बहुत पहले ही समाप्त हो चुका है। उन्होंने कहा, जाति अब केवल इसलिए जीवित है क्योंकि राजनीति इसे ऑक्सीजन दे रही है। उनके अनुसार, विचारधारा से ऊपर उठकर राजनीतिक दल केवल चुनावी लाभ के लिए जाति के नाम पर वोट मांगते हैं, क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से में आज भी जातिगत पहचान गहराई से पैठी हुई है।

जाति-आधारित संघर्षों और समाज में व्याप्त भेदभाव पर प्रतिक्रिया देते हुए, आरएसएस प्रमुख ने एक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की अपील की। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन संघर्षों का समाधान केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए समाज के भीतर संवेदनशीलता और सहानुभूति की आवश्यकता है। भागवत ने इस बात पर चिंता जताई कि राजनेता सामाजिक एकता के बजाय विभाजनकारी पहचानों को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि वे अपने वोट बैंक को सुरक्षित रख सकें।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब आरएसएस अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और देश में जाति जनगणना जैसे मुद्दे राजनीतिक केंद्र बने हुए हैं। भागवत का यह संबोधन संघ के उस दीर्घकालिक लक्ष्य की ओर इशारा करता है, जिसे वे सामाजिक समरसता कहते हैं—जहाँ हिंदू समाज की आंतरिक दूरियों को खत्म कर एक एकजुट राष्ट्र की कल्पना की जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि भागवत का यह बयान उन राजनीतिक दलों पर सीधा प्रहार है जो जातिगत गोलबंदी पर निर्भर हैं। साथ ही, यह संघ के स्वयंसेवकों के लिए भी एक संदेश है कि वे सामाजिक समानता की दिशा में कार्य करें और जातिगत दीवारों को ढहाने में अग्रणी भूमिका निभाएं।