बदले माहौल में अब भाषण से काम नहीं चलेगा
80वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए एक राष्ट्रव्यापी मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग प्लेटफॉर्म की महत्वाकांक्षी घोषणा की। प्रधानमंत्री ने कहा, गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के हजारों करोड़ रुपये के खर्च को बचाने के लिए, और ताकि उनके बच्चे अपने माता-पिता के पास रहकर ही अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें तथा उनकी सही देखभाल हो सके, इस देश के युवाओं को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पूरी तरह से मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग प्रदान की जाएगी।
लाल किले से की गई इस घोषणा में योजना के परिचालन और क्रियान्वयन से जुड़े सूक्ष्म विवरणों का अभाव था, लेकिन इसके पीछे की अंतर्निहित महत्वाकांक्षा अत्यंत विशाल है। सरकार का यह कदम भारत के सबसे महंगे और तेजी से बढ़ते निजी कोचिंग उद्योगों में से एक का राष्ट्रीय स्तर पर एक सुलभ और मुफ़्त विकल्प खड़ा करने जैसा है। परंतु, भारतीय प्रशासनिक और सामाजिक वास्तविकताओं को देखते हुए यह स्वीकार करना होगा कि हर बार की तरह स्वतंत्रता दिवस पर मात्र एक भव्य भाषण देकर निकल जाने से इस बार बात बनने वाली नहीं है।
कोचिंग उद्योग और शिक्षा प्रणाली की समस्या इतनी जटिल, गहरी और विकराल हो चुकी है कि केवल एक ऑनलाइन पोर्टल की घोषणा कर देने मात्र से इसका हल संभव नहीं है। यदि सरकार सचमुच गरीब और मध्यम वर्ग के करोड़ों परिवारों को इस भारी-भरकम आर्थिक और मानसिक बोझ से मुक्ति दिलाना चाहती है, तो उसे कागजी घोषणाओं और औपचारिक बयानों से आगे बढ़कर जमीन पर ठोस और नीतिगत काम करने की सख्त जरूरत आ पड़ी है।
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग का जो विशाल बाजार खड़ा हुआ है, वह महज किसी व्यावसायिक मॉडल का नतीजा नहीं है, बल्कि देश की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली और मुख्यधारा के शिक्षण संस्थानों के पूरी तरह चरमरा जाने का सीधा परिणाम है। सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर इस कदर गिर चुका है कि विद्यार्थी नियमित स्कूली शिक्षा के बल पर जेईई, नीट, यूपीएससी या बैंकिंग जैसी उच्च-स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करने की कल्पना भी नहीं कर सकते।
इस खाई को भरने के लिए ही कोटा, पटना, मुखर्जी नगर और सीकर जैसे कोचिंग हब उभरे, जिन्होंने धीरे-धीरे एक समानांतर और बेहद महंगी शिक्षा व्यवस्था का रूप ले लिया। निजी कोचिंग संस्थान न केवल सालाना लाखों रुपये की फीस वसूलते हैं, बल्कि देश के सुदूर इलाकों से आने वाले बच्चों को अपने घरों से दूर रहने पर मजबूर करते हैं। इसके चलते मध्यमवर्गीय परिवारों की जीवनभर की कमाई बच्चों की ट्यूशन और हॉस्टल की फीस में खत्म हो जाती है।
इसके अतिरिक्त, इन केंद्रों में प्रतिस्पर्धा का बेतहाशा दबाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है, जिसके दुखद परिणाम हम लगातार सामने आते छात्र आत्महत्याओं के मामलों के रूप में देखते हैं। ऐसे में, सरकार द्वारा एक मुफ्त ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लाने का विचार निसंदेह स्वागत योग्य है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यद्यपि देश में इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन देश के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आज भी निर्बाध हाई-स्पीड इंटरनेट, लैपटॉप, स्मार्टफोन और निरंतर बिजली की उपलब्धता एक बड़ा संकट बनी हुई है। दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि कोचिंग केवल अध्ययन सामग्री या रिकॉर्डेड लेक्चर्स उपलब्ध कराने का नाम नहीं है। एक छात्र को प्रतियोगी परीक्षा में सफलता पाने के लिए व्यक्तिगत मार्गदर्शन, नियमित शंका-निवारण, अनुशासित माहौल और सतत मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
केवल वीडियो लेक्चर अपलोड कर देने से वह माहौल तैयार नहीं किया जा सकता जो एक छात्र को कोचिंग संस्थान या समर्पित कक्षा में मिलता है। इसलिए, इस समस्या का स्थायी समाधान केवल लाल किले के भाषणों या डिजिटल ऐप तक सीमित नहीं रह सकता। सरकार को एक व्यापक और बहुस्तरीय रणनीति पर ठोस काम करना होगा। सर्वप्रथम, देश की स्कूली और उच्च शिक्षा प्रणाली के पाठ्यक्रम को प्रतियोगी परीक्षाओं के मानकों के अनुरूप ढालना होगा ताकि छात्रों को स्कूल के बाद अलग से किसी कोचिंग की जरूरत ही न पड़े।
दूसरा, सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी को दूर कर शिक्षण की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार करने होंगे। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से जताई गई मंशा सराहनीय हो सकती है, लेकिन यदि सरकार वास्तव में देश के गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के हजारों करोड़ रुपये बचाना चाहती है और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करना चाहती है, तो उसे शब्दों से आगे बढ़कर जमीनी कार्रवाई करनी होगी। अब वक्त सिर्फ बड़े-बड़े वादे करने और भाषण देकर आगे बढ़ जाने का नहीं है; अब इस ऐतिहासिक और आवश्यक पहल को धरातल पर उतारने के लिए निरंतर, गंभीर और ठोस काम करने की सख्त जरूरत है।