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जाति जनगणना से सच्चाई सामने आयेगी

भारत में सामाजिक न्याय और राजनीति के केंद्र में जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर पूरी प्रखरता के साथ उभरा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि देश की एक बड़ी आबादी की गहरी आकांक्षा बन चुका है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, जो संसद में वर्तमान में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं, 2017 से ही इस मुद्दे को निरंतर धार दे रहे हैं।

आज स्थिति यह है कि क्षेत्रीय दलों के घोषणापत्रों से निकलकर यह मांग कांग्रेस सहित लगभग समूचे विपक्ष (इंडिया गठबंधन) के राष्ट्रीय एजेंडे का हिस्सा बन चुकी है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आरक्षण हमेशा से एक संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात संविधान निर्माण के समय दलितों और आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने के लिए जनसंख्या के अनुपात में क्रमशः 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।

इसके अतिरिक्त, अन्य पिछड़ा वर्ग की लगभग 52 प्रतिशत आबादी को ध्यान में रखते हुए मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। हालांकि, आरक्षण की इस व्यवस्था को लेकर न्यायपालिका और विधायिका के बीच अक्सर वैचारिक मतभेद दिखते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में आरक्षण की अधिकतम सीमा को 50 प्रतिशत पर स्थिर रखने की बात कही है, जबकि तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्यों में यह सीमा पार हो चुकी है।

2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के फैसले ने इस बहस को और तेज कर दिया है। अब तर्क यह दिया जा रहा है कि यदि समाज के हर वर्ग को आरक्षण दिया जा रहा है, तो जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी के सिद्धांत पर आबादी के अनुसार आरक्षण देना ही सबसे न्यायसंगत तरीका है।

आरक्षण के इतिहास को देखें तो पिछड़ों के अधिकारों की लड़ाई लंबी रही है। आपातकाल के बाद जब देश में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, तब डॉ राममनोहर लोहिया के पिछड़े पाँवें सौ में साठ के विचार ने जोर पकड़ा। चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन हुआ। हालांकि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह रिपोर्ट वर्षों तक धूल फांकती रही।

अस्सी के दशक के अंत में जब वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का साहसिक निर्णय लिया। इस निर्णय ने उत्तर भारत की राजनीति की धुरी ही बदल दी और पिछड़ी जातियों का राजनीतिक उभार हुआ। 90 के दशक में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने पिछड़ों की एकजुटता के जरिए सत्ता के समीकरण बदले।

बाद के वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ों के कोटे की मांग उठी, जिसे 2004 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान अमली जामा पहनाया गया। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने 2019 के लोकसभा चुनाव और फिर 2022 के विधानसभा चुनाव में जातीय जनगणना को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाया। संसद में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उनके भाषणों में इस मुद्दे के प्रति गहरी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।

इसी दिशा में बिहार ने एक क्रांतिकारी उदाहरण पेश किया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने न केवल जातीय गणना कराने की पहल की, बल्कि उसके आंकड़े भी सार्वजनिक कर दिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के समय जातीय जनगणना का पुरजोर समर्थन किया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जनगणना में देरी कर रही है और लैटरल एंट्री जैसे रास्तों से आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने की कोशिश की जा रही है।

ऐसे में बिहार के आंकड़ों ने एक राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है, जिस पर देर-सबेर केंद्र को भी विचार करना पड़ सकता है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जातीय गणना से समाज में कटुता बढ़ेगी, लेकिन इसके समर्थकों का मानना है कि यह कटुता को समाप्त करने का माध्यम बनेगा। जब तक सभी जातियों और समूहों को उनकी वास्तविक जनसंख्या के आधार पर संसाधन और प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक मनमुटाव बना रहेगा।

जातीय जनगणना से सभी वर्गों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का स्पष्ट खाका सामने आएगा, जिससे सरकार को बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। लोकतंत्र का मूल आधार समानता और सामाजिक न्याय है। सामाजिक तनाव और भेदभाव को दूर करने के लिए वंचित तबके को विशेष अवसर प्रदान करना अनिवार्य है। यदि हमें एक समावेशी भारत का निर्माण करना है, तो हमें जाति के यथार्थ को स्वीकार करते हुए आंकड़ों के आधार पर विकास की रूपरेखा तैयार करनी होगी।