यूरोप के उपभोक्ताओँ को नया कानूनी अधिकार मिला
ब्रुसेल्सः यूरोपीय संघ ने ब्रुसेल्स में एक ऐसा विधायी कदम उठाया है, जिसे वैश्विक तकनीकी बाजार में उपभोक्ता शक्ति की वापसी के रूप में देखा जा रहा है। राइट टू रिपेयर (मरम्मत का अधिकार) नामक इस ऐतिहासिक कानून को मंजूरी देकर यूरोपीय संसद ने तकनीकी दिग्गजों और उपभोक्ताओं के बीच के शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदलने का प्रयास किया है। यह कानून न केवल आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन की उम्र बढ़ाएगा, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगा।
पिछले कई दशकों से तकनीकी कंपनियाँ प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस की नीति पर काम कर रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि उत्पादों को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे एक निश्चित समय (जैसे दो या तीन साल) के बाद खराब होने लगें। कई बार मरम्मत की लागत इतनी अधिक रख दी जाती है या उसके पुर्जे बाजार से गायब कर दिए जाते हैं कि उपभोक्ता मजबूरन पुराना उपकरण फेंककर नया खरीदने पर मजबूर हो जाता है। नया कानून इसी प्रथा पर कड़ा प्रहार करता है। अब कंपनियों को अपने उत्पादों का डिजाइन बदलते हुए उन्हें रिपेयर-फ्रेंडली बनाना होगा। इसका अर्थ है कि बैटरी, स्क्रीन और अन्य महत्वपूर्ण घटकों को ग्लू या विशेष पेंचों से बंद करने के बजाय ऐसा बनाया जाए कि उन्हें आसानी से बदला जा सके।
यूरोपीय संघ के इस कानून के तहत कंपनियों पर कई सख्त शर्तें थोपी गई हैं। कंपनियों को मरम्मत के लिए आवश्यक पुर्जे न केवल स्वतंत्र रिपेयर शॉप्स को, बल्कि आम उपभोक्ताओं को भी किफायती कीमतों पर उपलब्ध कराने होंगे। तकनीकी कंपनियों को मरम्मत से जुड़ी गाइड और मैनुअल सार्वजनिक करने होंगे, ताकि कोई भी कुशल मैकेनिक उत्पाद को ठीक कर सके। उत्पादों की वारंटी खत्म होने के बाद भी कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सॉफ्टवेयर अपडेट के माध्यम से डिवाइस को धीमा न किया जाए।
पर्यावरणविदों के अनुसार, यह कानून ई-कचरा कम करने की दिशा में दुनिया का सबसे प्रभावी हथियार साबित होगा। यूरोपीय संघ का अनुमान है कि इस कानून के प्रभावी होने से हर साल लाखों टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा कचराघरों में जाने से बचेगा। इसके अतिरिक्त, उपकरणों की लंबी आयु होने से यूरोपीय उपभोक्ताओं के सामूहिक रूप से अरबों यूरो की बचत होगी, जो पहले हर दूसरे साल नया फोन खरीदने में खर्च हो जाते थे।
जहाँ एक तरफ दुनिया भर के उपभोक्ता इस कानून का स्वागत कर रहे हैं, वहीं ऐपल, सैमसंग और गूगल जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों ने इस पर चिंता जताई है। कंपनियों का तर्क है कि ओपन एक्सेस देने से उत्पादों की साइबर सुरक्षा और उपभोक्ता की गोपनीयता को खतरा हो सकता है। साथ ही, उनका यह भी कहना है कि इससे उनकी बौद्धिक संपदा की चोरी होने का डर है। हालांकि, यूरोपीय संघ ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा के नाम पर मरम्मत के अधिकार को दबाया नहीं जा सकता।