Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Lucknow Fire Tragedy: अलीगंज की बिल्डिंग में भीषण आग; एसी डक्ट से फैली लपटों ने ली 15 जिंदगियां Ujjain Gaya Kotha Tirth: उज्जैन के गयाकोठा तीर्थ का बदलेगा स्वरूप; विकास कार्यों के लिए मिले 6.7 करो... Madhya Pradesh News: ट्रांसफर नियमों का उल्लंघन? एमएसएमई और पीडब्ल्यूडी में वरिष्ठता को लेकर बढ़ा विव... Gwalior JAH Hospital News: जया आरोग्य अस्पताल में पार्किंग के नाम पर खुली लूट; खुद अस्पताल के डॉक्टर... Gwalior Coaching Fire Safety: ग्वालियर में कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा राम भरोसे; केवल 3 के पास फायर... MP UCC Draft: मध्य प्रदेश में 10 दिन में तैयार होगा समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट; जानें आदिवासियों ... Gwalior News: डीएलएड परीक्षा में फर्जी परीक्षार्थी का खुलासा; चाचा दे रहा था भतीजे की जगह परीक्षा, प... Terror Module Exposed: भोपाल एटीएस की बड़ी कार्रवाई; 'लोन वुल्फ' मॉड्यूल तैयार करने वाले सरगना की रिम... Mephedrone Drugs Network: भोपाल में ड्रग्स बनाने वाले सिंडिकेट का भंडाफोड़; हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ... Seoni Jumbo Sitaphal GI Tag: सिवनी के सीताफल को मिला GI टैग; अब दुनिया भर में बिखेरेगा अपने स्वाद का...

तथ्यों और शर्तों का इंतजार करना होगा

संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के वर्तमान दूसरे कार्यकाल के दौरान चीजें नाटकीय रूप से बदल गई हैं। उन्होंने व्यापारिक भागीदारों से लाभ प्राप्त करने के लिए शुल्कों को एक राजनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है। उनका दर्शन यह है कि अमेरिका फर्स्ट

यहाँ टैरिफ व्यापार के वांछित पैटर्न, उसकी मात्रा और यहाँ तक कि कीमतों को निर्धारित करने का एक राजनीतिक हथियार बन गये हैं। आधुनिक इतिहास में पहले कभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार किसी एक राष्ट्र द्वारा अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के माध्यम से लाभ को अधिकतम करने का राजनीतिक प्लेबुक नहीं बना था।

अब हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ द्विपक्षीय व्यापारिक सौदों का बोलबाला बढ़ रहा है, जहाँ कई देश अमेरिका की मांगों के आगे झुकने के अलावा बहुत कम ही कुछ कर पा रहे हैं। हाल ही में घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को इसी बदलती दुनिया के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इस सौदे के विवरण के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।

ऐसा प्रतीत होता है कि सौदे पर अभी तक एक समझौते के रूप में हस्ताक्षर नहीं किए गए हैं। हमें जो ज्ञात है—मुख्य रूप से अमेरिकी पक्ष से—वह यह है कि अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर दंडात्मक शुल्क को अधिकतम 50 प्रतिशत से घटाकर 18 फीसद कर दिया है। अमेरिकी स्रोतों के अनुसार, यह इसलिए हुआ क्योंकि भारत तीन बातों पर सहमत हो गया है।

पहला, भारत कथित तौर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर सहमत हुआ है (जो वैसे भी घट रहा है)। संयोग से, रूस ने इस निर्णय की जानकारी होने से इनकार किया है। दूसरी बात जिस पर भारत सहमत हुआ है, वह है 500 अरब डॉलर मूल्य की अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं की खरीद, जिसमें रक्षा उपकरण, डेटा सेंटर, वेनेजुएला का कच्चा तेल और कुछ कृषि उत्पाद शामिल हैं।

तीसरी शर्त, जिस पर भारत सहमत होता दिख रहा है, वह भारत में आने वाले सभी अमेरिकी सामानों के लिए शुल्क-मुक्त प्रवेश है। भारत सरकार इन विवरणों के बारे में रहस्यमयी रूप से मौन है। हालांकि, उम्मीद के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारत को फिर से विश्वगुरु बनने की राह पर ले जाने के लिए प्रशंसा की बौछार की जा रही है।

विवरणों की कमी के बावजूद, इस व्यापार सौदे के बारे में कुछ टिप्पणियां आवश्यक हैं। शुल्कों में कमी से कुछ निर्यात क्षेत्रों, जो रोजगार पैदा करने वाले भी हैं (जैसे कपड़ा, जूते, रत्न और आभूषण), का दर्द कम होगा। अमेरिका को जेनेरिक दवाएं बेचने वाले फार्मा क्षेत्र को पहले ही छूट दी गई थी। हालांकि, कम टैरिफ पर बिक्री बढ़ सकती है, लेकिन भारत के प्रतिस्पर्धियों की सापेक्ष स्थिति भी मायने रखती है।

दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया के उन देशों की टैरिफ संरचना भी प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण होगी, जिन पर भी अमेरिका ने शुल्क लगाए हैं। ये शुल्क ज्यादातर 20 फीसद के आसपास हैं, जो भारत के लिए थोड़ा फायदेमंद है। हालांकि, टैरिफ दरों में बार-बार होने वाले उतार-चढ़ाव वाली दुनिया में भविष्य में कुछ भी हो सकता है। भारत ने जो स्वीकार किया है, वह अधिक चुनौतीपूर्ण है।

रूसी तेल की खरीद को जल्दबाजी में बंद करना लगभग असंभव है क्योंकि इसकी मात्रा बहुत अधिक है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वेनेजुएला के तेल की आपूर्ति श्रृंखला कितनी सुचारू रूप से और कितनी जल्दी स्थापित की जा सकती है और किस लागत पर। जहाँ तक 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान आयात करने की प्रतिबद्धता का सवाल है, यह एक चौंकाने वाली बड़ी संख्या है।

हमें इस बारे में कोई सुराग नहीं है कि इसकी समय सीमा कितनी है। शून्य शुल्क पर अमेरिकी उत्पादकों के लिए भारतीय कृषि के क्षेत्रों को खोलना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी समस्या होने वाला है। इसका विरोध व्यापक और शक्तिशाली होगा। अंत में, सभी अमेरिकी आयातों पर शून्य टैरिफ की बात पूरी तरह से एकतरफा और दूर की कौड़ी लगती है।

यदि ऐसा होता है, तो यह केवल इस सौदे को तय करने में भारत की विवशता का संकेत देगा। यूरोपीय संघ के साथ कुछ दिन पहले हुए द्विपक्षीय सौदे जैसे अन्य समझौतों के साथ, भारत को विशेष प्रतिबद्धताओं के कई सेटों को पूरा करने में कठिनाई होगी जो एक-दूसरे के अनुकूल नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए: ईयू-भारत व्यापार सौदा, जो अधिक व्यावहारिक लगता है, मादक पेय पदार्थों पर शुल्क को धीरे-धीरे 20% तक कम करने की परिकल्पना करता है। यदि अमेरिकी मादक पेय पदार्थों पर शून्य शुल्क लगना है, तो क्या इन दो सौदों को निष्पादित करने में कोई संघर्ष नहीं होगा? इन सभी सवालों का उत्तर तो अब मोदी सरकार को ही देना है, जिसने चुप्पी साध रखी है।