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चीन का बहुत बड़ा सैन्य युद्धाभ्यास चिंता का कारण

ताइवान जलडमरूमध्य में सैन्य हलचल और तेज हो गयी

ताइपेः ताइवान जलडमरूमध्य वर्तमान में एक सैन्य छावनी में तब्दील हो गया है। पिछले कुछ घंटों में बीजिंग की ओर से शुरू किए गए अचानक और आक्रामक सैन्य युद्धाभ्यास, ‘ज्वाइंट स्वॉर्ड-2026B’, ने न केवल दक्षिण चीन सागर बल्कि पूरे वैश्विक समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

यह अभ्यास न केवल आकार में विशाल है, बल्कि इसकी रणनीतिक टाइमिंग भी बीजिंग के सख्त तेवरों को स्पष्ट करती है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इस ऑपरेशन में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। रिपोर्टों के अनुसार, चीन के आधुनिक विमान वाहक पोत, उन्नत मिसाइल विध्वंसक और स्टील्थ लड़ाकू विमानों ने ताइवान की मध्य रेखा का उल्लंघन किया है।

यह रेखा लंबे समय से एक अनौपचारिक सीमा के रूप में मानी जाती रही है, जिसे पार करना सीधे तौर पर उकसावे की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। जवाब में, ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने अपनी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों को सक्रिय कर दिया है और अपने नौसैनिक जहाजों को ‘कॉम्बैट रेडी’ मोड में तैनात किया है।

इस सैन्य जमावड़े ने वाशिंगटन को भी तत्काल कार्रवाई के लिए मजबूर किया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने स्पष्ट किया है कि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में यथास्थिति को बलपूर्वक बदलने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध करेगा। अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े को हाई अलर्ट पर रखा गया है, जो इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए ‘नेविगेशन की स्वतंत्रता’ के सिद्धांतों का पालन कर रहा है।

इस तनाव का सबसे गंभीर पहलू आर्थिक है। ताइवान दुनिया का 60 प्रतिशत से अधिक और 90 प्रतिशत सबसे उन्नत सेमीकंडक्टर (चिप्स) बनाता है। जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का सैन्य अवरोध वैश्विक टेक उद्योग को ठप कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि चिप्स की आपूर्ति रुकने से स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों तक के उत्पादन पर संकट मंडरा रहा है।

तनाव की खबर आते ही वैश्विक शेयर बाजारों, विशेषकर नैस्डैक (Nasdaq) और अन्य टेक-केंद्रित इंडेक्स में भारी गिरावट देखी गई है। यह गतिरोध केवल क्षेत्रीय नहीं रह गया है। आगामी घंटों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आपात बैठक होने की प्रबल संभावना है, जहाँ शांति बहाली के लिए राजनयिक दबाव बनाया जाएगा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि ताइवान की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय सक्रियता और वहां के राजनीतिक परिदृश्य ने बीजिंग को अपनी ‘वन चाइना’ नीति के प्रति अधिक आक्रामक होने पर मजबूर कर दिया है।