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पारदर्शी सूचना से घबड़ाती मोदी सरकार

वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट संसद में पेश कर दी गई है। केंद्रीय बजट से ठीक पहले प्रस्तुत होने वाली यह रिपोर्ट हमेशा कई कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें न केवल देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति का लेखा-जोखा होता है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों और विकास की संभावनाओं का पूर्वानुमान भी लगाया जाता है।

इस वर्ष की रिपोर्ट ने न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को लेकर भी कुछ गंभीर और चिंताजनक भविष्यवाणियां की हैं। आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि विभिन्न देशों के बीच बढ़ते टैरिफ युद्ध और व्यापक भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण विश्व अर्थव्यवस्था एक बड़े संकट की ओर बढ़ रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, आने वाली यह मंदी 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी अधिक भयानक हो सकती है। हालांकि, रिपोर्ट में आशावाद का एक पुट भी है; जिस प्रकार 2008 की मंदी का भारत पर बहुत गहरा प्रभाव नहीं पड़ा था, वैसी ही उम्मीद इस बार भी जताई गई है। आगामी वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्तमान वित्त वर्ष के लिए यह अनुमान 6.5 प्रतिशत था। केंद्र सरकार का मानना है कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी गति से आगे बढ़ती रहेगी।

हालांकि, रिपोर्ट ने एक कड़वा सच भी स्वीकार किया है कि अगले एक साल तक देश में निवेश की स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं रहने वाली है। जहां एक ओर अर्थशास्त्री विकास दर के आंकड़ों में उलझे हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक गलियारों और नागरिक संगठनों में सूचना का अधिकार अधिनियम के भविष्य को लेकर भारी बेचैनी देखी जा रही है। इस वर्ष की आर्थिक समीक्षा में वर्तमान आरटीआई कानून के ढांचे में संशोधन और सुधार का प्रस्ताव दिया गया है, जिसने देश भर में एक नई बहस छेड़ दी है।

2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार के दौरान लागू किया गया सूचना का अधिकार अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। पिछले दो दशकों में इस कानून ने जनता और सरकार के बीच एक पारदर्शी सेतु का कार्य किया है। इसका मकसद आम आदमी को सरकारी फाइलों तक पहुंच प्रदान कर उसे शक्तिशाली बनाना।

सरकारी धन के उपयोग और योजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता लाना। भ्रष्टाचार के स्रोतों को उजागर करने में आरटीआई ने एक सुरक्षा कवच की भूमिका निभाई है। संक्षेप में, आरटीआई ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को मजबूत किया है और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है। आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में आरटीआई के वर्तमान ढांचे की आलोचना करते हुए कहा गया है कि यह कई बार सरकारी कार्यों की गति को धीमा कर देता है।

रिपोर्ट में दिए गए मुख्य तर्क इस प्रकार हैं। सरकारी कर्मचारियों का बहुत अधिक समय उन सवालों के जवाब देने में नष्ट हो जाता है जो अक्सर तुच्छ या अप्रासंगिक होते हैं। कुछ मामलों में प्रशासनिक रूप से संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक होने के कारण परियोजनाओं के कार्यान्वयन में अनावश्यक देरी होती है।

इन्हीं आधारों पर सरकार इस कानून में बड़े संशोधनों की वकालत कर रही है। लेकिन असली चिंता यह है कि यदि इस कानून के ढांचे को कमजोर किया गया, तो इसका सीधा प्रहार देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर होगा। आलोचकों का तर्क है कि सुधार के नाम पर सरकार दरअसल अपनी जवाबदेही को कम करना चाहती है।

यदि जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया को कठिन बनाया गया या अधिकारियों को जानकारी छिपाने की अधिक शक्तियाँ दी गईं, तो भ्रष्टाचार को फिर से पनपने का अवसर मिलेगा। लोकतंत्र में जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसका पैसा कहां और कैसे खर्च हो रहा है। आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट एक ओर आर्थिक प्रगति का सपना दिखा रही है, तो दूसरी ओर लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा रही है।

क्या आरटीआई के ढांचे में बदलाव वाकई प्रशासनिक गति बढ़ाएगा, या यह केवल जनता से सच छिपाने का एक जरिया बनेगा? आने वाले बजट सत्र में इस पर होने वाली चर्चा यह तय करेगी कि भारत का लोकतंत्र पारदर्शिता की ओर बढ़ेगा या गोपनीयता के अंधकार में खो जाएगा। इसका जीता जागता उदाहरण पर राहुल गांधी द्वारा जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देने को लेकर देख रहे हैं।

यानी एक पुस्तक में लिखी चंद लाइनें भी मोदी सरकार के दावों पर भारी पड़ रही है। संसद का यह विवाद जारी रहने के बीच असली सवाल यह है कि सरकार सूचनाओँ के सार्वजनिक होने से इतनी भयभीत क्यों हैं और कहां कहां किस फाइल में कौन सा राज छिपा हुआ है, इसे जनता की नजरों से दूर क्यों रखा जा रहा है। यह तो सच है कि जनता के पैसे से ही सरकार चल रही है।