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ममता बनर्जी का शीर्ष अदालत जाना चर्चा में

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं को भी प्रभावित किया दलीलों ने

  • पहली बार यहां उपस्थित हुई थी

  • वह वकील नहीं अपनी पैरवीकार थी

  • जमीनी लड़ाई को ऊपर ले जाने का साहस

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को चुनौती देने के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उपस्थिति ने कानूनी बिरादरी के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ अपेक्षित थीं, वहीं वकीलों ने विचारधारा से ऊपर उठकर इस घटना के संवैधानिक अनूठेपन, अदालती शिष्टाचार और कानूनी बारीकियों पर ध्यान केंद्रित किया। लोग यह मान रहे हैं कि जमीनी नेता जब मैदान में आता है तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है।

उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आकाश शर्मा ने इसे अभूतपूर्व क्षण बताते हुए इसके महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, एक मौजूदा मुख्यमंत्री का स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना और मौखिक दलीलें देना ऐतिहासिक है। यह मतदाता सूची विवाद की राजनीतिक संवेदनशीलता और संवैधानिक महत्व दोनों को उजागर करता है। शर्मा ने अदालत में बनर्जी के आचरण की सराहना करते हुए कहा कि एक अधिवक्ता होने के नाते उन्होंने पूरी शिष्टता के साथ, अपने मुख्य वकील और भारत के मुख्य न्यायाधीश से अनुमति लेकर ही अपनी बात रखी।

सोशल मीडिया पर बनर्जी के पहनावे को लेकर हो रही चर्चाओं पर कई वकीलों ने आपत्ति जताई। अधिवक्ता सौरव चंद्र ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार, गाउन और बैंड केवल पैरवी करने वाले वकीलों के लिए अनिवार्य हैं। यदि कोई व्यक्ति इन-पर्सन (स्वयं) पेश होता है, तो वह इन्हें पहनने का हकदार नहीं है। ड्रेस कोड क्षमता पर निर्भर करता है, डिग्री पर नहीं। उन्होंने याद दिलाया कि ममता बनर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून स्नातक हैं।

यह बात भी उठी कि मुख्यमंत्री ने एक वकील के रूप में नहीं, बल्कि एक पैरवीकार के रूप में अपनी बात रखी, जिसकी देश के कानून में पूरी अनुमति है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वह वकील की पोशाक पहनतीं, तो यह हितों के टकराव का मामला बन सकता था, जब तक कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न दे दें।

कानूनी समुदाय के कुछ सदस्यों के लिए यह एक भावनात्मक क्षण भी था। 11 वर्षों से अभ्यास कर रही अधिवक्ता देबोलीना डे ने कहा, यह पहली बार है जब किसी मुख्यमंत्री ने आम लोगों के लिए लड़ाई अपने हाथों में ली है। एक महिला अधिवक्ता होने के नाते मुझे इस पर गर्व है।

युवा कानून छात्रों और अन्य वकीलों ने इसे नपा-तुला लेकिन प्रभावी चुनावी दांव करार दिया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही इस मुकदमे का परिणाम कुछ भी हो, लेकिन ममता बनर्जी ने समाज के गरीब तबके और भद्रलोक मतदाताओं के बीच अपनी छवि मजबूत कर राजनीतिक लाभ हासिल कर लिया है।