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सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी का नया रिकार्ड

सुप्रीम कोर्ट में उनकी दलीलों पर आयोग को नोटिस जारी

  • उनकी बहस सुनने भारी भीड़ थी

  • शानदार तरीके से अपनी दलीलें दी

  • आयोग के व्हाट्सएप खेल की पोल खोली

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट में आज मुख्य न्यायाधीश की इजलास और अदालत परिसर में सिर्फ इस बात की वजह से भारी भीड़ थी क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बतौर अधिवक्ता एसआईआर के खिलाफ अपनी दलीलें पेश की। उन्हें सुनने के लिए भी अधिवक्ताओं की भीड़ अंदर मौजूद थी। बुधवार को इस मामले में स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखा, जिसके बाद अदालत ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर कड़े निर्देश दिए हैं।

26 नवंबर 2025 से पश्चिम बंगाल सहित 12 राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई थी। बंगाल में इसकी अंतिम तिथि 7 फरवरी है और अंतिम सूची 14 फरवरी को प्रकाशित होनी है। समयसीमा समाप्त होने के करीब देख मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल मनुभाई पांचोली की पीठ ने सुनवाई की। अपनी बात रखते हुए ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग द्वारा बार बार व्हाट्सएप के जरिए निर्देश भेजे जाने का भी मुद्दा रख दिया।

ममता बनर्जी के वकील श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि अब तक 88 लाख मतदाताओं की सुनवाई हो चुकी है, लेकिन अभी भी 63 लाख लोग शेष हैं। मात्र चार दिनों में इसे पूरा करने के लिए प्रतिदिन 15.5 लाख सुनवाई करनी होगी, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है। ममता बनर्जी ने मांग की है कि पश्चिम बंगाल का 2026 विधानसभा चुनाव 2025 की मतदाता सूची के आधार पर ही कराया जाए।

राज्य सरकार का आरोप है कि भाजपा शासित राज्यों से 8300 माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं, जिनके पास मतदाताओं के नाम काटने की शक्ति है और उन्होंने निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के अधिकार छीन लिए हैं। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त ‘ग्रुप-बी’ अधिकारी न मिलने के कारण अन्य राज्यों से सहायता लेनी पड़ी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि, राज्य सरकार को सोमवार तक उन ‘ग्रुप-बी’ अधिकारियों की सूची देनी होगी जो बांग्ला भाषा और स्थानीय बोलियों में कुशल हैं। यदि ऐसे अधिकारी नियुक्त होते हैं, तो माइक्रो ऑब्जर्वर की आवश्यकता नहीं होगी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 2002 की सूची बांग्ला में थी, जिसके अनुवाद के दौरान वर्तनी की गलतियां होना स्वाभाविक है। उपनाम या वर्तनी में छोटी-मोटी त्रुटियों के कारण किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जाना चाहिए।

अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि नोटिस भेजते समय अधिकारी अधिक संवेदनशील बनें। बूथ स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षर के बिना कोई भी दस्तावेज वैध नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और विसंगतियों की सूची वेबसाइट पर अपलोड की जानी चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई आगामी सोमवार को होगी, जिसमें राज्य सरकार को अधिकारियों की उपलब्धता पर जवाब देना है।