Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
संसद के मानसून सत्र के अंतिम दिन राज्यसभा में जोरदार हंगामा, खरगे के 'मंच शुद्धिकरण' बयान पर सत्ता प... सतवास के मोहाईजागीर में नाले के तेज बहाव में मासूम बच्चा लापता, रातभर सर्चिंग के बाद फिर शुरू हुआ रे... ग्वालियर में 13 वर्षीय नाबालिग किशोरी का अपहरण कर दिल्ली में दुष्कर्म, पुलिस ने आरोपी को किया गिरफ्त... सिंहस्थ 2028 के लिए एमपी सरकार का बड़ा कदम, UDA के पूर्व प्रमुख जगदीश अग्रवाल बने सिंहस्थ मेला प्राध... मध्य प्रदेश में अब रातभर गुलजार रहेंगे बाजार, राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने 'मध्य प्रदेश कार्यस्थल सशक्ति... आखिरकार सागर में बनेगा नया एयरपोर्ट: केंद्रीय मंत्री और विधायक शैलेंद्र जैन की वार्ता के बाद रास्ता ... छतरपुर में दर्दनाक हादसा: जटाशंकर धाम से लौट रही अनियंत्रित कार 50 फीट गहरे कुएं में गिरी, 1 युवक की... चार दशकों से ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य की अधिसूचना लंबित, MP हाईकोर्ट ने स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड क... श्योपुर: अतिक्रमण हटाने गई वन विभाग की टीम पर पथराव व हमला, कई कर्मचारी घायल; रघुनाथपुर थाने में माम... दुबई से अवैध कारोबार चलाने वाले सतीश सनपाल को झटका: MP हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार, चलेग...

गैर भाजपा शासित राज्यों को शीर्ष अदालत से मिला हथियार

केंद्रीय अधिकारियों पर राज्य कर सकते हैं मुकदमा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि राज्यों के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और अधिकार प्राप्त राज्य पुलिस कर्मियों को केंद्रीय सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमा चलाने का पूरा अधिकार है। इसके लिए सीबीआई से किसी भी प्रकार की अनुमति या सहमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

यह फैसला गैर-एनडीए शासित राज्यों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, जो अक्सर केंद्र पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों का उपयोग करके उन्हें निशाना बनाती है। अब पश्चिम बंगाल में ईडी के खिलाफ दायर मामले तथा रांची में पुलिस की ईडी कार्यालय की जांच को भी कानूनी आधार मिल गये हैं।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सोमवार को यह फैसला सुनाया, जिसका आधिकारिक आदेश मंगलवार को अपलोड किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह निष्कर्ष कि राजस्थान राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का अधिकार है, भले ही आरोपी केंद्र सरकार का कर्मचारी हो, पूरी तरह सही है। हाईकोर्ट ने यह सही माना है कि यह कहना गलत है कि केवल सीबीआई ही ऐसा मुकदमा शुरू कर सकती है।

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि किसी विशेष कानून (जैसे दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम) की मौजूदगी मात्र से आपराधिक प्रक्रिया संहिता के संचालन को बाहर नहीं माना जा सकता। जब तक विशेष कानून स्पष्ट रूप से जांच के लिए अलग प्रावधान नहीं करता, तब तक सीआरपीसी की धारा 156 के सामान्य प्रावधान ही प्रभावी रहेंगे।

यह फैसला नवल किशोर मीणा की उस अपील को खारिज करते हुए आया, जिसमें उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। मीणा का दावा था कि राज्य का भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो किसी केंद्रीय कर्मचारी पर मुकदमा नहीं चला सकता।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की व्याख्या करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि पीसी एक्ट की धारा 17 के अनुसार, राज्य एजेंसी, केंद्रीय एजेंसी या कोई भी पुलिस एजेंसी (निश्चित रैंक के अधिकारी द्वारा) जांच कर सकती है। अदालत ने अंत में स्पष्ट किया, धारा 17 राज्य पुलिस या राज्य की किसी विशेष एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार के मामलों की जांच करने या मामला दर्ज करने से नहीं रोकती है।