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आईपीएस अफसर आखिर केंद्र की तरफ क्यों भाग रहे

थम नहीं रहा सुशासन सरकार पर उठते सवालों का सिलसिला

  • ईमानदार अफसर क्यों छोड़ रहे राज्य

  • राज्य प्रशासन के अंदर क्या चल रहा

  • इसे महज संयोग मानना भी भूल

दीपक नौरंगी

पटनाः बिहार कैडर के भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों का केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति पर जाने का बढ़ता रुझान अब प्रशासनिक गलियारों में चिंता का विषय बन गया है। पिछले कुछ महीनों में एक दर्जन से अधिक काबिल अधिकारी बिहार छोड़कर केंद्रीय सेवाओं में जा चुके हैं, जबकि आधा दर्जन से अधिक अधिकारी अभी जाने की प्रक्रिया में हैं।

यह स्थिति महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया न होकर सिस्टम के भीतर पनप रही गहरी बेचैनी का संकेत देती है। हाल के दिनों में गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों में रिक्तियां भरने के आदेश जारी किए हैं, जिनमें बिहार कैडर के अधिकारियों की संख्या सर्वाधिक है।

गौरव मंगला (2013 बैच): इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में इनकी तैनाती खासी चर्चा में है। नवादा एसपी रहते हुए अपने ही पुलिसकर्मियों को हाजत में बंद करने के विवाद और एडीजी अनिल किशोर यादव द्वारा उनके खिलाफ एफआईआर के आदेश के बावजूद, इतनी महत्वपूर्ण एजेंसी में उनकी आसानी से नियुक्ति कई सवाल खड़े करती है।

आशीष भारती और स्वप्ना मेश्राम (2011 बैच): इस पति-पत्नी की जोड़ी को सीआरपीएफ में प्रतिनियुक्ति मिली है। जितेंद्र कुमार (1993 बैच), राकेश राठी, पी. कन्नन और अशोक मिश्रा जैसे अनुभवी अधिकारी भी केंद्र जाने की कतार में हैं। वहीं, राजीव मिश्रा का सीबीआई से लौटने के बाद दोबारा केंद्र जाना भी प्रशासनिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से राज्य में सुशासन और बेहतर कानून-व्यवस्था का दावा करते रहे हैं। वर्तमान में डीजीपी विनय कुमार के नेतृत्व में पुलिस महकमा टीम भावना के साथ काम करने का प्रयास कर रहा है, फिर भी सक्षम अधिकारियों का बाहर जाना इस दावे के विपरीत तस्वीर पेश करता है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि कई ईमानदार और सक्षम अधिकारी बिहार के वर्तमान कार्य परिवेश में स्वयं को सीमित या असहज महसूस कर रहे हैं। जब व्यवस्था के भीतर कार्य करने की स्वायत्तता कम होने लगती है, तो अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को प्राथमिकता देते हैं।

अनुभवी अफसरों के जाने से न केवल पुलिसिंग की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि जांच प्रक्रियाओं और आम जनता के भरोसे पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। यह स्थिति बिहार सरकार के लिए एक आईने की तरह है। क्या यह बीस साल के सुशासन की सफलता है या तंत्र की विफलता? अब देखना यह है कि राज्य सरकार अनापत्ति प्रमाण पत्र देने को लेकर अपनी नीति में क्या बदलाव लाती है और इस पलायन को रोकने के लिए क्या कदम उठाती है।