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बिहार में आईपीएस अधिकारियों का पलायन

सुशासन मॉडल और प्रशासनिक कार्यशैली पर उठते सवाल

  • पलायन के पीछे के गंभीर प्रश्न

  • दिल्ली जाने वालों की लंबी लाइन

  • प्रशासनिक स्थिरता पर प्रभाव

दीपक नौरंगी

पटनाः बिहार के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है। राज्य कैडर के दो दिग्गज आईपीएस अधिकारियों, राजीव मिश्रा और दलजीत सिंह का केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति पर जाना केवल एक स्थानांतरण नहीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

गृह मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आदेशों के अनुसार, पटना के पूर्व सीनियर एसपी और वर्तमान डीआईजी राजीव मिश्रा को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में डीआईजी के पद पर तैनाती दी गई है। वहीं, 2007 बैच के कड़क अधिकारी और सीआईडी में आईजी के पद पर कार्यरत दलजीत सिंह अब सीमा सुरक्षा बल में अपनी सेवाएं देंगे। इन दोनों अधिकारियों की विदाई के लिए अब केवल राज्य सरकार के अनापत्ति प्रमाण पत्र का इंतज़ार है।

नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल में अधिकारियों के इस तरह लगातार दिल्ली कूच करने ने कई चर्चाओं को जन्म दिया है। वर्तमान में बिहार कैडर के लगभग 16 से 17 आईपीएस अधिकारी पहले से ही केंद्र में तैनात हैं। चर्चा है कि एक दर्जन से अधिक अन्य अधिकारी भी इसी कतार में हैं। आखिर क्या वजह है कि अनुभवी अधिकारी राज्य में सेवा देने के बजाय केंद्रीय एजेंसियों को प्राथमिकता दे रहे हैं?

प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिहार में काम करने की परिस्थितियां अब इतनी चुनौतीपूर्ण हो गई हैं कि अधिकारी वहां घुटन महसूस कर रहे हैं? दलजीत सिंह जैसे अधिकारी, जो अपनी स्पष्टवादिता और फाइलों में बारीक खामियां निकालने के लिए जाने जाते हैं, उनका जाना व्यवस्था की आंतरिक खींचतान की ओर इशारा करता है।

वापसी और फिर प्रस्थान: राजीव मिश्रा का मामला दिलचस्प है। वे सीबीआई से कार्यकाल पूरा होने से पहले बिहार लौटे थे, लेकिन अब पुनः सीआईएसएफ में जाना दर्शाता है कि शायद राज्य की कार्यशैली उन्हें रास नहीं आई।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य के सबसे अनुभवी और सक्षम अधिकारी केंद्र की ओर रुख करेंगे, तो बिहार की कानून-व्यवस्था और पुलिसिंग पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। नैयर हसनैन खान जैसे उदाहरण भी हैं जो केंद्र से लौटकर राज्य में महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन सामूहिक पलायन की यह स्थिति चिंताजनक है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इन अधिकारियों को रोकने के लिए कार्य वातावरण में क्या सुधार करती है या फिर यह सिलसिला यूं ही जारी रहता है।