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बिहार हथियार लाइसेंस घोटाला: सुशासन पर सवाल और प्रशासनिक जवाबदेही की दरकार

अफसरों में अनेक लोग जानते हैं यह सच

  • डीएम की इस कार्यशैली पर उठे सवाल

  • पटना हाईकोर्ट का रुख बहुत सख्त

  • जवाबदेही और सुशासन की अग्निपरीक्षा

दीपक नौरंगी

भागलपुरः बिहार में हथियार लाइसेंस घोटाले ने एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में एक जिलाधिकारी द्वारा अपने कार्यकाल के अंत में 458 हथियार लाइसेंस जारी किए जाने का चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिनमें से अधिकांश जिले से बाहर के लोगों को दिए गए थे। यह मामला तब सामने आया जब एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा की, जिससे पूरे बिहार से लेकर दिल्ली तक प्रशासनिक गलियारों में हलचल मच गई

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यह घटना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन के दावों पर सीधा सवाल उठाती है। सूत्रों के अनुसार, इन लाइसेंसों को जारी करने में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी और अनियमितता की आशंका जताई जा रही है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इतनी बड़ी संख्या में बिना उचित सत्यापन के हथियार लाइसेंस जारी करना कई गंभीर बिंदुओं पर जांच की मांग करता है, जैसे:किन परिस्थितियों और किन लोगों को लाइसेंस दिए गए? कितने महीनों के भीतर ये लाइसेंस जारी हुए? क्या बाहरी जिलों के लोगों को लाइसेंस देने के पीछे कोई खास मंशा थी?

यह पहला मामला नहीं है जब बिहार में हथियार लाइसेंस घोटाले सामने आए हैं। इससे पहले, पटना हाईकोर्ट ने 2003-04 के एक पुराने मामले में सख्त रुख अपनाते हुए 6 महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का आदेश दिया था, जिसमें एक पूर्व डीएम ने बिना पुलिस सत्यापन के हथियार लाइसेंस बांटे थे। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक लापरवाही और नियमों का उल्लंघन एक पुरानी समस्या है।

जिलाधिकारी एक जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होते हैं, जिन पर कानून-व्यवस्था और नियमों के पालन की अहम जिम्मेदारी होती है। हथियार लाइसेंस जारी करना एक अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया है जिसमें गहन पुलिस सत्यापन अनिवार्य है। ऐसे में 458 लाइसेंसों का बिना किसी सत्यापन के जारी होना प्रशासनिक अनुशासनहीनता और शक्तियों के दुरुपयोग को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक डीएम, जिसने इतनी बड़ी लापरवाही की, उसे दंडित करने के बजाय राजभवन में प्रधान सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर दिया जाता है, तो यह सुशासन के दावे पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या यह सरकार द्वारा ऐसे अधिकारियों को संरक्षण और पुरस्कार देने जैसा नहीं है?

बिहार में हथियार लाइसेंस घोटाला केवल प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह समाज की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा है। बिना सत्यापन के हथियार लाइसेंस जारी करना अपराध को बढ़ावा दे सकता है। सरकार को इस मामले में न केवल सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि सुशासन का दावा हकीकत में बदल सके और आम जनता का प्रशासन पर भरोसा कायम रह सके।