वेनेजुएला संकट और अमेरिकी हथियार व्यापार
21वीं सदी के तीसरे दशक का मध्य वैश्विक राजनीति के लिए एक ऐसा टर्निंग पॉइंट साबित हो रहा है, जहाँ कूटनीति की जगह सीधे सैन्य हस्तक्षेप और संप्रभुता के हनन ने ले ली है। वेनेजुएला में हालिया अमेरिकी कार्रवाई—जिसमें राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, तेल संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण का दावा और रूसी टैंकरों की जब्ती शामिल है—ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ अस्थिरता ही एकमात्र नया नॉर्मल प्रतीत होती है।
लेकिन यदि हम इस पूरी घटनाक्रम की परतों को उधेड़ें, तो इसके पीछे केवल लोकतंत्र की बहाली या नार्को-आतंकवाद का खात्मा नहीं, बल्कि एक सोची-समझती आर्थिक रणनीति दिखाई देती है, जो अंततः अमेरिका को दोहरे लाभ की स्थिति में पहुँचाती है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने एक बार फिर अपनी उस छवि को पुख्ता किया है, जिसमें वह स्वयं को दुनिया का स्वघोषित पुलिसकर्मी मानता है।
वेनेजुएला के मामले में पटकथा बहुत स्पष्ट थी: पहले मादुरो सरकार पर नार्को-आतंकवाद के आरोप लगाकर धमकियां दी गईं, फिर रणनीतिक हमले किए गए और अंततः विशेष सैन्य अभियान चलाकर एक संप्रभु राष्ट्र के प्रमुख को गिरफ्तार कर अमेरिकी धरती पर लाया गया। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के इतिहास में एक दुर्लभ और खतरनाक मिसाल है।
इस सैन्य आक्रामकता के तुरंत बाद अमेरिका ने वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों पर अपना दावा ठोक दिया। अटलांटिक महासागर में रूसी ध्वज वाले तेल टैंकर की जब्ती ने आग में घी डालने का काम किया है। इन घटनाओं ने न केवल रूस और चीन जैसी महाशक्तियों को ललकारा है, बल्कि लैटिन अमेरिका और दुनिया के अन्य विकासशील देशों में असुरक्षा की गहरी भावना पैदा कर दी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी दुनिया में अस्थिरता बढ़ती है, देशों का ध्यान जन-कल्याण और विकास से हटकर रक्षा और सुरक्षा पर केंद्रित हो जाता है। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में अपनाई गई जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली नीति ने छोटे और मध्यम देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उनकी संप्रभुता कभी भी खतरे में पड़ सकती है। जब अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थान सुरक्षा की गारंटी देने में विफल होने लगते हैं, तो देश आत्मरक्षा के लिए हथियारों के भंडार की ओर भागते हैं।
यहीं से शुरू होती है हथियारों की खरीद-फरोख्त की वह होड़, जिसका फायदा सीधे तौर पर अमेरिका को मिलता है। यह कोई रहस्य नहीं है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा उसके सैन्य-औद्योगिक परिसर पर टिका है। हथियारों का निर्यात अमेरिका की आय का सबसे बड़ा और विश्वसनीय स्रोत है। दुनिया जितनी अधिक डरी हुई और अस्थिर होगी, अमेरिकी लड़ाकू विमानों, मिसाइल प्रणालियों और निगरानी यंत्रों की मांग उतनी ही अधिक बढ़ेगी। अमेरिका इस संकट से दोतरफा लाभ उठाने की स्थिति में है।
पहला लाभ (ऊर्जा नियंत्रण): वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार वाले देशों में से एक है। मादुरो को हटाकर और तेल क्षेत्र पर नियंत्रण करके, अमेरिका न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि वैश्विक तेल कीमतों को भी अपनी इच्छाशक्ति के अनुसार नियंत्रित करने की क्षमता हासिल कर रहा है। यह सीधे तौर पर रूस और मध्य-पूर्व के देशों की आर्थिक शक्ति को चुनौती देने जैसा है।
दूसरा लाभ (शस्त्र बाजार): वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य शक्ति के सफल प्रदर्शन ने उसके हथियारों (जैसे एफ-35 और एफ-22) की मार्केटिंग का काम किया है। साथ ही, रूस और चीन के प्रति बढ़ते तनाव के कारण अब नाटो देश और एशियाई सहयोगी अपने रक्षा बजट को बढ़ाने पर मजबूर होंगे। जब पूरी दुनिया अशांत होगी, तो वे सुरक्षा के लिए उसी देश के पास जाएंगे जिसके पास सबसे आधुनिक विनाशकारी तकनीक है।
वेनेजुएला की घटना केवल एक देश के शासन परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि एक नए विश्व व्यवस्था का संकेत है जहाँ आर्थिक लाभ के लिए सैन्य शक्ति का उपयोग सामान्य माना जाएगा। पूरी दुनिया को यह समझना होगा कि अमेरिका द्वारा पैदा की गई यह अस्थिरता एक कृत्रिम संकट हो सकता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक शांति की कीमत पर अपनी अर्थव्यवस्था के दो मुख्य स्तंभों—तेल और हथियारों—को मजबूती प्रदान करना है।
यदि वैश्विक समुदाय ने संप्रभुता के इस खुले उल्लंघन और शस्त्र संस्कृति को बढ़ावा देने वाली इन नीतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो आने वाले समय में विकास की चर्चा गौण हो जाएगी और पूरी मानवता केवल बारूद के ढेर पर बैठी अपनी बारी का इंतजार करेगी। इससे साफ हो जाता है कि जिस बात की चर्चा अभी बिल्कुल नहीं हो रही है, दरअसल वह भी डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत बढ़ाया गया एक कदम है। अन्य टेक्नोलॉजी में दुनिया के अन्य देशों से पिछड़ जाने की वजह से अब अमेरिकी कमाई का यह रास्ता आसान है।