फडणवीस ने भाजपा के लोगों को चेतावनी दी
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राजनीति में एक दूसरे के विरोधी
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मुख्यमंत्री खुद इससे परेशान हो गये
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दोनों गठबंधन में दरार जैसी हालत
राष्ट्रीय खबर
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति ने एक बार फिर अपने अनप्रेडिक्टेबल होने का प्रमाण दिया है। राज्य के दो स्थानीय निकायों में सत्ता के समीकरणों ने राष्ट्रीय स्तर की वैचारिक शत्रुता को धता बताते हुए सभी को स्तमत कर दिया है। यहाँ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस—जो एक-दूसरे के धुर वैचारिक विरोधी माने जाते हैं—ने हाथ मिला लिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस गठबंधन को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का भी समर्थन प्राप्त है। इस महा-खिचड़ी गठबंधन का एकमात्र उद्देश्य शिवसेना (यूबीटी) को सत्ता से बाहर रखना था।
देवेंद्र फडणवीस का कड़ा रुख और अनुशासन का चाबुक इस गठबंधन की खबर फैलते ही भाजपा खेमे में हड़कंप मच गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 7 जनवरी 2026 को इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए इसे घोर अनुशासनहीनता करार दिया। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि पार्टी अपनी मूल विचारधारा से समझौता करने वाले किसी भी नेता को बख्शने वाली नहीं है। फडणवीस ने स्पष्ट किया कि स्थानीय स्तर पर वर्चस्व कायम करने के लिए कांग्रेस और एआईएमआईएम जैसी पार्टियों के साथ जाना भाजपा के सिद्धांतों के विरुद्ध है। मुख्यमंत्री का मानना है कि ऐसे गठबंधन न केवल पार्टी की छवि को धूमिल करते हैं, बल्कि निष्ठावान मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं, जिससे भविष्य के बड़े चुनावों में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण और स्थानीय निकाय चुनावों में अक्सर व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय समीकरण राष्ट्रीय विचारधारा पर हावी हो जाते हैं। शिवसेना (यूबीटी) को रोकने की होड़ में स्थानीय नेताओं ने आलाकमान की परवाह किए बिना यह प्रयोग किया है। हालांकि, यह गठबंधन महाराष्ट्र की वृहद राजनीति में चल रही महायुति (भाजपा-एकनाथ शिंदे शिवसेना-अजीत पवार राकांपा) और महाविकास अघाड़ी (कांग्रेस-शरद पवार राकांपा-उद्धव शिवसेना) की बड़ी तस्वीर में दरारें पैदा कर सकता है।
भविष्य के समीकरण और भाजपा की चिंता भाजपा आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि स्थानीय स्तर पर ऐसे अपवित्र गठबंधन सफल हो जाते हैं, तो भविष्य में राज्य स्तर पर गठबंधन धर्म और पार्टी अनुशासन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। पार्टी अब उन नेताओं की पहचान करने में जुटी है जिन्होंने इस सौदेबाजी में मुख्य भूमिका निभाई है। आने वाले दिनों में महाराष्ट्र भाजपा के भीतर बड़े संगठनात्मक बदलाव या निलंबन की कार्रवाई देखने को मिल सकती है, जो यह संदेश देगी कि विचारधारा से ऊपर कुछ भी नहीं है।