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बर्फ की चादर में लिपटा सुंदरगढ़ का कोइडा

ओडिशा के सुंदरगढ़ में कुदरत का अनोखा करिश्मा

  • अंचभित करने वाला बदलाव है

  • बर्फ की पतली चादर बिछ गयी

  • ओस की बूंदे जमीन पर जम गयी

राष्ट्रीय खबर

भुवनेश्वर: भारत का पूर्वी राज्य ओडिशा, जो अपनी लंबी तटरेखा, जगन्नाथ मंदिर और गर्मियों में पड़ने वाली भीषण तपिश के लिए विश्व विख्यात है, इन दिनों एक बिल्कुल अलग और अचंभित करने वाले प्राकृतिक बदलाव का गवाह बन रहा है। राज्य के सुंदरगढ़ जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न केवल मौसम वैज्ञानिकों को बल्कि आम जनता को भी हैरान कर दिया है। जिले के कोइडा और बोनाई वन क्षेत्रों में इस मौसम की पहली बर्फबारी दर्ज की गई है, जिसने पूरे इलाके को एक मिनी कश्मीर में तब्दील कर दिया है।

तापमान में भारी गिरावट और जमा देने वाली ठंड कल रात से ही सुंदरगढ़ के इन पहाड़ी इलाकों में पारा नाटकीय ढंग से गिरना शुरू हुआ। रात के दूसरे पहर तक तापमान 5 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर नीचे चला गया। इस भीषण गिरावट के कारण हवा में मौजूद नमी और घास पर जमी ओस की बूंदें जम गईं, जिससे सुबह होते-होते चारों तरफ बर्फ की एक महीन सफेद चादर बिछ गई। स्थानीय निवासियों के लिए यह नजारा जितना विस्मयकारी था, उतनी ही चुनौतियां भी साथ लाया। कड़ाके की ठंड के कारण लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए हैं।

जनजीवन पर असर और बचाव के उपाय कोइडा के ग्रामीण इलाकों में सुबह का दृश्य बिल्कुल बदला हुआ था। खेतों, पेड़ों की पत्तियों, वाहनों के ऊपर और घरों की छतों पर बर्फ जमी देखी गई। इस असामान्य ठंड ने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। सुबह के समय बाजार और सड़कें सूनी नजर आ रही हैं। ठंड से बचने के लिए ग्रामीण लकड़ी और सूखे पत्तों का अलाव जलाकर खुद को गर्म रखने की कोशिश कर रहे हैं। जिला प्रशासन ने इस शीतलहर को देखते हुए बुजुर्गों और बच्चों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है और लोगों को पर्याप्त गर्म कपड़े पहनने की सलाह दी है।

विशेषज्ञों की राय और कृषि पर संकट मौसम विभाग के अनुसार, सुंदरगढ़ के इन इलाकों की विशेष भौगोलिक स्थिति, ऊंचे पहाड़ों और सघन वन क्षेत्र के कारण अक्सर यहां तापमान कम रहता है, लेकिन बर्फ जमने जैसी स्थिति दुर्लभ है। कृषि विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि यह जमा देने वाली ठंड और पाला कुछ दिनों तक और जारी रहा, तो रबी की फसलों और सब्जियों पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन का संकेत? पर्यटकों के लिए जहाँ यह एक रोमांचक अनुभव है, वहीं पर्यावरणविद् इसे जलवायु परिवर्तन के बदलते पैटर्न से जोड़कर देख रहे हैं। गैर-पारंपरिक शीत क्षेत्रों में इस तरह की बर्फबारी और चरम मौसम की घटनाएं भविष्य के लिए एक चेतावनी भी हो सकती हैं। यह घटना स्पष्ट करती है कि अब हिमालय से दूर प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में भी हिमालयी ठंड का अहसास संभव हो चला है।