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बंगाल नहीं यूपी का शहरी अलगाव खतरनाक

भारत की चुनावी राजनीति में समय-समय पर आने वाले प्रशासनिक बदलाव अक्सर गहरे सामाजिक संकेतों को छिपाए रहते हैं। वर्तमान परिदृश्य में, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और निर्वाचन आयोग के बीच एक प्रत्यक्ष और तीखी लड़ाई जगजाहिर है।

यदि हम राजनीतिक विवादों के केंद्र में रहने वाले पश्चिम बंगाल या अन्य गैर-भाजपा शासित राज्यों के शोर-शराबे को एक पल के लिए दरकिनार भी कर दें, तो उत्तर प्रदेश में मसौदा मतदाता सूची के हालिया प्रकाशन ने एक बेहद गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी है। इस प्रकाशन ने न केवल सामान्य राजनीतिक गलियारों में बेचैनी पैदा की है, बल्कि इसने भारतीय लोकतंत्र की शहरी वास्तविकता और इसके चुनावी प्रशासन के बीच मौजूद एक गहरे संरचनात्मक अलगाव को भी पूरी तरह से नग्न कर दिया है।

जब हम इन सूचियों का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि प्रस्तावित विलोपन का एक बहुत बड़ा और चिंताजनक हिस्सा शहरी क्षेत्रों में केंद्रित है। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि यह मुद्दा महज किसी एक दल की राजनीतिक मंशा या हेरफेर से कहीं अधिक बड़ा है। वास्तव में, यह इस बात का संकेत है कि हमारा लोकतंत्र नागरिकों की बढ़ती गतिशीलता के साथ तालमेल बिठाने में किस तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है।

प्रथम दृष्टया, मतदाता सूची से नामों का हटाया जाना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया प्रतीत होती है। शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में विलोपन की संख्या का असंगत रूप से अधिक होना यह नहीं दर्शाता कि शहर के निवासी चुनावी प्रक्रिया से विमुख हो गए हैं या उनमें राजनीतिक चेतना की कमी है। इसके विपरीत, यह इस सत्य को उजागर करता है कि भारतीय शहरों में एक विशाल तैरती हुई आबादी निवास करती है, जो शहरी पते को अपनी राजनीतिक पहचान का स्थायी आधार नहीं मानती।

भारत के ग्रामीण अंचलों से शहरों की ओर पलायन करने वाले लाखों श्रमिक और पेशेवर एक दोहरी जिंदगी जीते हैं। वे आर्थिक कारणों से शहरों में तो रहते हैं, लेकिन सचेत रूप से अपना मतदाता पंजीकरण अपने पैतृक गाँवों में ही सुरक्षित रखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, मतदाता सूची से शहरी नामों का गायब होना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह उस मतदाता के सचेत चुनाव को भी दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक भारत में शहर आज भी केवल एक आर्थिक केंद्र के रूप में देखे जाते हैं, जबकि गाँव ही व्यक्ति का वास्तविक राजनीतिक आधार बना हुआ है।

इस चुनावी गणित का सीधा असर राजनीतिक दलों की रणनीतियों पर पड़ता है। किसी भी दल की शहरी निर्वाचन शक्ति केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि मतदाता उसे पसंद करता है या नहीं, बल्कि इस पर टिकी होती है कि क्या वह मतदाता सूची में दर्ज है और मतदान के दिन उपस्थित है। जब शहरों में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी जैसे दलों की उन धारणाओं को तगड़ा झटका लगता है जो शहरी मतदाताओं को अपना सुरक्षित वोट बैंक मानती रही हैं।

अनुभव यह बताता है कि जिन राजनीतिक दलों के पास बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का सघन जाल है और जो साल भर मतदाताओं के साथ जीवंत संपर्क बनाए रखते हैं, वे ही ऐसी प्रशासनिक चुनौतियों से निपटने में सक्षम होते हैं। ऐसे दल मतदाताओं को सुधार तंत्र और पंजीकरण की जटिल प्रक्रियाओं के माध्यम से सही दिशा दिखा सकते हैं। इसके विपरीत, जो दल केवल पिछली जीत के आंकड़ों या किसी सामयिक राजनीतिक लहर के भरोसे बैठे रहते हैं, उन्हें जल्द ही यह एहसास हो जाता है कि संगठनात्मक सुस्ती किस तरह एक बड़े चुनावी जोखिम में तब्दील हो सकती है।

प्रवासी मतदाताओं को लोकतंत्र से बाहर नहीं किया जा रहा है, बल्कि उनसे शायद इतिहास में पहली बार यह स्पष्ट और कठिन सवाल पूछा जा रहा है कि उनकी राजनीतिक नागरिकता वास्तव में कहाँ बसती है? उन्हें यह तय करना होगा कि वे जहाँ कमा रहे हैं वहां के नागरिक बनेंगे या जहाँ से उनकी जड़ें जुड़ी हैं, वहां के। भाजपा जैसे शहरी आधार वाले दलों के लिए यह स्थिति असहज हो सकती है, क्योंकि उनकी गणना अक्सर शहरी मध्यवर्ग की संख्या पर टिकी होती है।

यह पूरी प्रक्रिया एक कड़वी संस्थागत हकीकत को रेखांकित करती है कि भारत का राजनीतिक भूगोल आज भी इसके आर्थिक भूगोल से काफी पीछे चल रहा है। हमारे शहर लाखों लोगों के श्रम को तो सोख लेते हैं, लेकिन वे उन श्रमिकों को राजनीतिक अपनेपन का अहसास कराने में विफल रहे हैं। जैसे-जैसे भविष्य में प्रवासन भारत के शहरी परिदृश्य को और अधिक बदलेगा, हमारी चुनावी राजनीति में आर्थिक गतिशीलता और राजनीतिक जड़ता के बीच का यह द्वंद्व और अधिक मुखर होकर उभरेगा।