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झारखंड पर भी पड़ेगा डोमिसाइल सर्टिफिकेट का असर

एसआईआर के बीच ही निर्वाचन आयोग का तुगलकी फैसला

  • बंगाल के लिए जारी किया निर्देश

  • लाखों मतदाताओं का भविष्य अधर में

  • झारखंड में इस पर आग लग चुकी है पहले

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मतदाता सूची के पुनरीक्षण की चल रही प्रक्रिया के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसे तुगलकी फरमान कहा जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि सुनवाई के दौरान नागरिकता या निवास के प्रमाण के रूप में जमा किए गए डोमिसाइल सर्टिफिकेट (निवास प्रमाण पत्र) को अब वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

आयोग के इस अचानक आए फैसले से लाखों मतदाताओं का भविष्य अधर में लटक गया है। वैसे यह निर्देश पश्चिम बंगाल के लिए जारी हुआ है  लेकिन डोमिसाइल सर्टिफिकेट का मामला होने की वजह से इसका असर झारखंड पर भी पड़ना तय है। अब चुनाव आयोग यह भी नहीं कर सकता कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट का मामला सिर्फ पश्चिम बंगाल पर ही लागू होगा। दूसरी तरफ यह सभी को पता है कि इसी डोमिसाइल को लेकर झारखंड में कई बड़े और आक्रामक आंदोलन पहले हो चुके हैं। जिनकी आंच से सरकार भी उलट गयी थी।

मामला उन नो-मैप मतदाताओं से जुड़ा है, जिनका नाम 2002 की मतदाता सूची में या उनके रिश्तेदारों के नाम के साथ नहीं मिल रहा था। आयोग ने ड्राफ्ट सूची के प्रकाशन के बाद ऐसे लोगों को नोटिस भेजकर सुनवाई के लिए बुलाया था। उन्हें निर्देश दिया गया था कि वे आयोग द्वारा निर्धारित 13 दस्तावेजों में से कोई भी एक साक्ष्य प्रस्तुत कर अपनी भारतीय नागरिकता और पात्रता सिद्ध करें। इन 13 दस्तावेजों में संबंधित राज्य द्वारा जारी स्थायी निवास या अधिवास प्रमाण पत्र भी शामिल था। इसी के आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं ने सुनवाई के दौरान डोमिसाइल सर्टिफिकेट जमा किए थे।

प्रारंभ में, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने राज्य सरकार से पूछा था कि ये प्रमाण पत्र किस स्तर के अधिकारी जारी करते हैं। राज्य ने स्पष्ट किया कि 1999 तक यह शक्ति जिलाधिकारियों के पास थी, जिसके बाद अब एडीएम और एसडीएम इन्हें जारी करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि एसडीएम ही इस प्रक्रिया में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं। बावजूद इसके, दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि राज्य द्वारा जारी डोमिसाइल सर्टिफिकेट वह ‘स्थायी निवास प्रमाण पत्र’ नहीं है जिसे आयोग मान्यता देता है।

आयोग के इस रुख से उन मतदाताओं में हड़कंप मच गया है जिन्होंने पहले ही दस्तावेज जमा कर दिए थे। अब उन्हें फिर से सुनवाई के लिए बुलाया जा सकता है और नए सिरे से साक्ष्य मांगे जा सकते हैं। दूसरी ओर, दक्षिण 24 परगना के मगराहाट और कुलपी में रोल ऑब्जर्वर सी. मुरुगन के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों को आयोग ने गंभीरता से लिया है। पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक से 6 जनवरी तक रिपोर्ट मांगी गई है और इसे सुरक्षा की गंभीर विफलता बताया गया है।