दमोह: कचरा बीनने वाली छोटी-छोटी बच्चियों ने जीवन में सोचा भी नहीं होगा की वह कभी अच्छे कपड़े पहन पाएंगी और कुछ नया सीखकर अपने परिवार के लिए सम्मान से जीने का जरिया बनेंगी. लेकिन भ्रमण के दौरान देखा गया एक नजारा कई कचरा बीनने वाली और अनाथ बच्चियों का जीवन बदलने की वजह बन गया. आज ये बच्चियां कचरा बीनने के बजाय ट्रेनिंग लेकर आत्मनिर्भर बनने की राह पर आगे बढ़ रही हैं. कोई सिलाई सीख रही हैं, कोई बैग और रेडीमेड गारमेंट्स बना रही है तो कोई ब्यूटी पार्लर की ट्रेनिंग ले रही हैं. वह अपने परिवार का सहारा बन रही हैं.
कचरा बीनने वाली बच्चियों पर पड़ी कलेक्टर की नजर
दमोह सहित पूरे जिले में घुमंतू समुदायों की संख्या बहुत अधिक है. इन परिवारों के बच्चे कचरा, प्लास्टिक, पॉलिथीन बीनकर इसे कबाड़ियों को बेचते हैं और उससे उनके परिवार का गुजर बसर होता है. लेकिन पिछले वर्ष कुछ ऐसा हुआ कि अब यह कचरा बीनने वाले बच्चे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो रहे हैं. कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर जब भ्रमण के दौरान कहीं जा रहे थे उसी समय उनकी नजर कुछ छोटी-छोटी बच्चियों पर पड़ी जो पीठ पर एक बड़ा सा थैला टांगकर बाजार में कचरा बीन रही थीं.
बच्चियों को स्वावलंबी बनाने की ठानी
उन्होंने गाड़ी रुकवा कर उनसे बातचीत की और उनका नाम पता पूछा. इसके बाद उन्होंने महिला बाल विकास एवं सेडमैप (Centre for Entrepreneurship Development Madhya Pradesh) के अधिकारियों को ऐसे बच्चों का सर्वे करके उन्हें प्रशिक्षण देने तथा स्वावलंबी बनाकर समाज की मुख्य धारा में शामिल करने के निर्देश दिए. इसके बाद जिले में सर्वे किया गया. कुछ अभिभावक शुरुआत में सहमत नहीं हुए, लेकिन समझाइश के बाद कई परिवारों ने अपनी बच्चियों को ट्रेनिंग दिलाने की सहमति दी.
सेडमैप केंद्र में ले रहीं ट्रेनिंग
वर्तमान में दमोह की सेडमैप केंद्र और किशुन तलैया क्षेत्र में 25-25 बच्चियां तथा तेंदूखेड़ा में 80 बच्चियां सिलाई, स्कूल बैग, रेडीमेड गारमेंट्स और ब्यूटी पार्लर का प्रशिक्षण ले रही हैं. हालांकि इसके लिए 3 महीने की समय सीमा तय की गई है. लेकिन इन बच्चियों के लिए यह समय सीमा कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि यदि यह बच्चियां और प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहे तो वह संस्थान जाती रहेंगी. इसके लिए उन्हें किसी तरह की कोई मनाही नहीं है.
मुश्किल से जारी हुए बच्चियों के माता-पिता
सेडमैप के जिला समन्वयक पीएन तिवारी ने बताया कि, ”जब हमने सर्वे किया और बच्चियों और उनके माता-पिता से बात की तो पहले तो माता-पिता सहमत ही नहीं थे. लेकिन उन्हें किसी तरह राजी किया गया. कई बच्चियों ने ब्यूटी पार्लर, कुछ ने सिलाई तो कुछ ने बैग और रेडीमेड गारमेंट्स का काम सीखने पर सहमति जताई. पिछले साल हमने 20 बच्चियों को एक कंपनी के माध्यम से ट्रेंड किया था.
जब तक यह बच्चियां खुद का रोजगार शुरु करने में कॉन्फिडेंट नहीं हो जाती है तब तक वह ट्रेनिंग लेती रहेंगी. बच्चियों ने झंडे और एसआईआर के लिए बैगों का निर्माण किया है. ट्रेनिंग के दौरान जो भी निर्माण वह करती हैं उनका पारिश्रमिक भी उन्हें दिया जाता है. 50 बच्चियां दमोह में और 80 बच्चियां तेंदूखेड़ा में प्रशिक्षण ले रही हैं. उनके कचरा उठाने वाले कार्य को छुड़ाकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने का काम कर रहे हैं.”
साफ सुथरे कपड़े पहनने का मिल रहा मौका
प्रशिक्षण प्राप्त कर रही इन बच्चियों की उम्र महज 13-14 साल से लेकर 20 साल तक है. अंदाजा लगाया जा सकता है की गंदगी में से प्लास्टिक बीनने जैसा काम करके यह लोग अपने परिवार का पालन पोषण करती हैं. कैदो की तलैया से आने वाली बच्ची कल्पना और आनंदी ने बताया कि, ”कुछ बच्चियां अभी भी मजबूरी के कारण सुबह के वक्त कचरा बीनती हैं और दोपहर में यहां पर प्रशिक्षण प्राप्त करती हैं, ताकि उनका घर चलता रहे.”
रोली और अमोली ने बताया कि जब वह कचरा बीनती थी तो उन्हें बहुत गंदा लगता था. लोग उन्हें गलत नजर से देखते थे. अब साफ सुथरे कपड़े पहनकर प्रशिक्षण लेने जाते हैं. यहीं पर हमें नाश्ता भी मिलता है.” कुछ महीनों बाद जब यह काम सीख जाएंगी तो अपना खुद का काम शुरु कर आत्मनिर्भर बन जाएंगी.