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अमेरिका के इशारों पर नाचना भारत को अब महंगा पड़ा

पुतिन ने रियायती तेल से इंकार कर दिया

  • रूसी तेवर में अब तल्खी नजर आयी

  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और आपूर्ति संकट

  • अमेरिकी छूट और भू-राजनीतिक दबाव

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः वैश्विक ऊर्जा बाजार में मचे हड़कंप के बीच भारत और रूस के बीच पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे सस्ते तेल के दौर पर विराम लगता दिख रहा है। पश्चिम एशिया के संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को वर्ष 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँचा दिया है, जिसके बाद रूस ने भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल बेचने से इनकार कर दिया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारतीय रुख पर तंज कसते हुए कहा है कि भविष्य में तेल की बिक्री केवल व्यावसायिक शर्तों पर होगी, न कि पिछली अधिमान्य दरों पर। विदेशी मीडिया में आयी सूचनाओं के मुताबिक, पुतिन ने संकेत दिया कि भारत ने पहले बिना बताए रूसी तेल खरीदना कम कर दिया था और अब संकट के समय फिर से इसकी मांग कर रहा है। यह बदलाव काफी चौंकाने वाला है, क्योंकि फरवरी के अंत तक रूसी यूराल्स कच्चा तेल ब्रेंट बेंचमार्क से 10 से 13 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिल रहा था। इसके विपरीत, अब मार्च और अप्रैल की डिलीवरी के लिए यूराल्स पर ब्रेंट की तुलना में 4 से 5 डॉलर का प्रीमियम मांगा जा रहा है।

इस स्थिति के पीछे मुख्य कारण 28 फरवरी को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की शुरुआत के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना है। इस समुद्री मार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 फीसद हिस्सा कट गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, संघर्ष पूर्व के स्तर से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इसी बीच, भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों ने लगभग 2 करोड़ बैरल रूसी कच्चे तेल को सुरक्षित करने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

भारतीय कंपनियों की इस खरीदारी को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा 6 मार्च को जारी की गई 30 दिनों की प्रतिबंध छूट से बल मिला है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने कहा कि यह कदम ईरान द्वारा वैश्विक ऊर्जा को बंधक बनाने के प्रयास से उत्पन्न दबाव को कम करने के लिए उठाया गया है। यह छूट 4 अप्रैल को समाप्त होगी। हालांकि, क्रेमलिन का वर्तमान कड़ा रुख नई दिल्ली द्वारा पूर्व में वाशिंगटन के दबाव में आकर रूसी तेल आयात घटाने के फैसले की सजा के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि पूर्व में राष्ट्रपति ट्रंप ने रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, जिसके बाद भारत आयात कम करने पर सहमत हुआ था।