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सरपंच का अनोखा अंदाज़, भालू बनकर गांव को बंदरों से दिलाई राहत

चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करना आम बात मानी जाती है, लेकिन उन वादों को निभाना हर जनप्रतिनिधि के बस की बात नहीं होती. तेलंगाना के निर्मल जिले से आई एक खबर ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादा मजबूत हो, तो अनोखे तरीके से भी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है. हाल ही में यहां हुए सरपंच चुनाव के बाद एक युवा सरपंच अपने वादे को निभाने के लिए खुद मैदान में उतर आए और उनकी पहल अब चर्चा का विषय बन गई है.

दरअसल, निर्मल जिले के कदेम मंडल स्थित लिंगपुर गांव पिछले तीन वर्षों से बंदरों के आतंक से परेशान था. गांव में बंदरों की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि वे फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ घरों में घुसकर रोजमर्रा की चीजें भी छीन ले जाते थे. ग्रामीणों ने कई बार इस समस्या से निजात पाने की कोशिश की. पिछले साल गांव वालों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर बंदरों को पकड़ने के लिए पिंजरे भी लगाए, लेकिन कुछ बंदर पकड़े जाने के बावजूद समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी.

चुनाव जीतने के बाद निभाया अपना वादा

इस बार सरपंच चुनाव के दौरान बंदरों का आतंक ही गांव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया. ग्रामीणों ने उम्मीदवारों से साफ कह दिया कि जो भी जीते, उसे इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना होगा. इसी बीच चुनाव मैदान में उतरे कुमारी रंजीत ने वादा किया कि वे किसी भी कीमत पर गांव को बंदरों के आतंक से मुक्त कराएंगे. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अपने वादे को निभाने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया.

भालू का वेश धारण कर भगाए बंदर

सरपंच कुमारी रंजीत ने भालू का वेश धारण किया और पूरे गांव की गलियों में घूम-घूमकर बंदरों को भगाने लगे. जैसे ही बंदरों ने भालू के रूप में सरपंच को देखा, वे डरकर इधर-उधर भागने लगे. सरपंच ने घंटों तक गांव का चक्कर लगाया, जिससे बंदरों का झुंड गांव छोड़कर जंगल की ओर चला गया. यह नजारा देखकर ग्रामीण हैरान भी हुए और खुश भी.

ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली बार है जब किसी जनप्रतिनिधि ने समस्या के समाधान के लिए खुद इतना प्रयास किया हो. युवा सरपंच के इस कदम की गांव ही नहीं, आसपास के इलाकों में भी जमकर तारीफ हो रही है. कुमारी रंजीत ने कहा कि अगर भविष्य में बंदर दोबारा गांव में लौटते हैं, तो वे फिर से किसी नए रूप में उतरने के लिए तैयार हैं.